कोई आत्मा नहीं है. अस्तित्व हमें केवल एक मौका देता है और उसके बाद वह हमसे छुटकारा पा लेता है। वह हमें बार-बार क्यों सहती रहे। यह नए लोगों को मौका क्यों नहीं देता? यह नए लोगों को मौका देता है। इसीलिए तो हर पल नये बच्चे जन्म लेते हैं। इसीलिए, अस्तित्व नये बच्चों के साथ खेलता है। और तो और अस्तित्व तो हमारा है, जीवित रहते हुए भी, न जीते हुए भी हम अलग कैसे हो सकते हैं? नहीं, हम अलग नहीं हैं. हम ही अस्तित्व हैं, सदैव। कुछ भी अलग नहीं, कुछ भी आत्मा नहीं। आत्मा और परमात्मा दोनों बकवास कांसेप्ट हैं. एनर्जी कभी नहीं मरती. ठीक, बदलती है. यही विज्ञान भी मानता है. एनर्जी सिर्फ रूप बदलती है. और पदार्थ भी एनर्जी का ही रूप है. घना रूप. यह सब विज्ञान मानता है. हम अभी पदार्थ हैं. मर जायेंगे. घनत्व खत्म. एनर्जी जो अभी इस तन और मन की वजह से अस्तित्व से अलग आभासित है, वो आभास खत्म. द्वैत अद्वैत हो जायेगा. अलग दिखने वाली, महसूस होने वाली एनर्जी/घनत्व कॉस्मिक एनर्जी में विलीन हो जाएगी. न तो आत्मा आज है, न कल थी और न ही कल होगी. इसलिए आत्मा कोई वस्त्र नहीं बदलती है. जो लहर एक बार समंदर से उठी, वो विलीन हो गय...