सारा कल्चर "एग्रीकल्चर" पर खड़ा है.
फिर “कंट्री” का कांसेप्ट पैदा हुआ. कुछ परिवार जहाँ एक स्थान पर इकट्ठा रहते थे, उसे “कंट्री” कहा जाने लगा. अंग्रेज़ी में आज भी कंट्री शब्द गाँव के लिए प्रयोग होता है. बाद में कहीं कंट्री शब्द राष्ट्र के लिए प्रयोग होने लगा. शुरू में गाँव ही लोगों के लिए उनका कंट्री हुआ करता था. आज भी दिल्ली में रिक्शा चलाने वाले बिहारी कहते हैं कि उनका ‘मुलुक’ बिहार है.
कुछ इस तरह इन्सान परिवार से राष्ट्र तक की इकाइयों में बंटता गया.
पृथ्वी एक, इंसानियत एक, पूरी कायनात एक. लेकिन इंसान बंटा है. इंसान इंसान के बीच दीवारें खड़ी करता जाता है, बंटता जाता है और बहुत खुश है. बंटता जाता है और कटता जाता है, फिर भी बहुत खुश है.
सब विभाजनों की जड़ में 'निजी सम्पत्ति' और 'निजी बच्चा' है. न तो ज़मीन कभी कहती है कि वो किसी खास व्यक्ति की है और न ही कोई बच्चा. बच्चे को आप सिखाते हैं कि वो किसका है, अन्यथा वो कभी नहीं कहेगा कि वो किसी का है. वो कोई चीज़ थोड़ा न है जिस पर किसी की मल्कियत हो. वो कुदरत का है, कायनात का है. वो कुदरत है, कायनात है.
आज ज़रुरत है 'निजी बच्चे' और 'निजी सम्पति' के कांसेप्ट को ध्वस्त करने की. उससे अगला कदम 'राष्ट्र' के कांसेप्ट को ध्वस्त करने का होगा.
तब जाकर “वसुधैव कुटुम्बकम” का कांसेप्ट यथार्थ रूप लेगा. बिना कुटुम्ब की धारणा धराशाई करे, कभी “वसुधैव कुटुम्बकम” की धारणा यथार्थ रूप न लेगी.
नमन
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