Does God Exist? Review - जावेद अख़्तर और मुफ़्ती शमाइल की लल्लनटॉप डिबेट का रिव्यु
"Does God Exist? डिबेट का ग़लत टाइटल"
बहस का टाइटल है गॉड पर और दोनों व्यक्ति बहस कर रहे हैं खुदा पर. पहले यह तो तय कर लेते कि बहस किस पर है. क्या गॉड, ईश्वर, अल्लाह एक ही हैं? "ईश्वर अल्लाह तेरो नामा." क्या यह सही है? नहीं है. ईश्वर को मानने वाले भी क्या मोहम्मद को ईश्वर का आखिरी पैगंबर मानते हैं? नहीं मानते तो फिर कैसे हो गए सब एक. भाई, ईसाई भी तो हज़रत मोहम्मद साहेब को अपना पैगंबर नहीं मानते तो कैसे इन शब्दों का एक ही मतलब है. सो पहले तो बहस यह होनी चाहिए थी कि किस गॉड/खुदा/ अल्लाह पर बहस हो रही है. "Does God Exist? डिबेट के लिए ग़लत कैंडिडेट का चुनाव"
"Does God Exist? डिबेट की Methodology (विधि-विधान) पर सवाल"
मुफ़्ती ने कहा कि खुदा का वजूद सिर्फ़ अक्ल से तय होगा न कि विज्ञान या रिलिजन से, वैरी गुड. तो क्या विज्ञान या रिलिजन में अक्ल का कोई शुमार नहीं है? यह एक ग़लत स्टैंडर्ड सेट किया गया था. यह बहस को बाँधने वाली बात थी. ओपन बहस होनी चाहिए थी, जिस को जहाँ से तर्क मिले उसे वह तर्क देने की छूट होनी चाहिए थी. सिंपल.
फिर कहा गया कि मुश्किल शब्दों का प्रयोग नहीं होगा, होगा तो अर्थ बताया जायेगा. वैरी गुड. पूरी बहस में क्या अंग्रेजी की फ़लसफ़ी टर्म, उर्दू के शब्दों का प्रयोग नहीं हुआ? अरे, कौन बोलता है इस तरह की उर्दू भारत में? मैंने शायद ही किसी को सुना हो, इस तरह की उर्दू बोलते हुए और न ही सुना कभी इस तरह की फ़लसफ़ी टर्मिनोलॉजी को प्रयोग करते हुए लोगों को. घर से सोच के आते न कि आसान भाषा, आसान शब्दावली, आम टर्म्स. जावेद साहेब तक बार-बार पूछ रहे हैं कि जो कंटिंजेंसी, इनफिनिट रग्रेस्सिवनेस आदि शब्द आप प्रयोग कर रहे हैं, उन का मतलब क्या है? तो जनता क्या समझेगी?
और डिबेट करनी थी तो ऑडियंस में मुस्लिम ही मुस्लिम कैसे? कर लेते कुछ मुस्लिम को invite लेकिन कुछ नास्तिकों को भी invite करते. कितने ही एक्स-मुस्लिम हैं जो यूट्यूब पर एक्टिव हैं, उन को. तो माहौल शायद कुछ और ही होता.
और जो जनता वहां बिठाल रखी थी, उस की कहाँ सुन रहे थे अंत में ये लोग. बोलने तक दे नहीं रहे थे, उन को. डेढ़ घंटा सुनाया, लेकिन सुना डेढ़ मिनट भी नहीं जनता में से किसी को.
"Does God Exist? बहस में मुफ़्ती जी का जगह-जगह झोल-झाल"
डिबेट शुरू करने से पहले ही मुफ़्ती जी ने कहा कि तमाम तारीफें उस क्रिएटर के लिए जिस ने इस यूनिवर्स को एक मकसद के लिए पैदा किया है. गुड. मेरा एतराज़ यहीं से है.
तारीफें? वैसे तो अभी तय हुआ ही नहीं पता नहीं कि कोई क्रिएटर है भी कि नहीं लेकिन है भी तो तारीफें? आप को कैसे पता उसे तारीफें पसंद हैं? शायद पसंद हों, शायद न हों? आप बिना उस की मर्ज़ी जानें अपनी तरफ से ही तारीफें किये जा रहे हैं.
खैर, डिबेट रिलिजन आधारित नहीं होगी. यही कहा था न मुफ़्ती जी ने? मुफ़्ती जी से बिना रिलिजन की बहस की उम्मीद करना ही गलत है और गलत साबित हुआ भी आगे जा कर.
गज़ा में जो बच्चे मर रहे हैं उन बड़ा शोक जता रहे थे मुफ़्ती जी आप, वो क्या रिलिजन बेस्ड नहीं है? अगर नहीं है तो फिर इजराइल पर जो हमास ने आक्रमण किया उनके बच्चे मार दिए, औरतों का बलात्कार किया, 250 के करीब लोग किडनैप कर लिए, उन का भी ज़िक्र क्यों नहीं किया आप ने? क्या घटनाएं-दुर्घटनाएं जुडी हुई नहीं हैं? और आप कहते हैं कि इजराइल तो एक्सिस्ट ही नहीं करता, वो occupied पलेस्टाइन है. मुसलमानों के अलावा भी किसी और से पूछ लेते कि इस बारे में क्या ख्याल है?
ग़ज़ा में जो बच्चे मर रहे हैं, नहीं मरने चाहिए, असल में तो कोई बच्चा-बड़ा नहीं मरना चाहिए, लेकिन आप कह रहे हैं कि ग़ज़ा में मरने वाले बच्चों का खुदा टेस्ट ले रहा है, क्या यह धारणा इस्लामिक नहीं है, चूँकि हिन्दुओं या बौद्धों या जैनियों में तो ऐसे कोई धारणा सुनी नहीं गयी?
आप गॉड पर डिबेट करने गए थे या इस्लामिक एजेंडा फ़ैलाने?
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"Does God Exist? डिबेट में मुफ़्ती साहेब के खुदा पर तर्कों का खण्डन"
"पिंक बॉल से कायनात तक"
मुफ़्ती साहेब कहते हैं कि यदि हम एक निर्जन आइलैंड पर पहुँचते हैं और यदि कोई पिंक बॉल नज़र आती है तो पहला सवाल यही दिमाग में आता है कि इसे बनाया किस ने होगा?
नहीं आता है पहला ख्याल यह?
ज़रूरी नहीं.
आप के दिमाग में आता होगा, हरेक के दिमाग में आता है आप को कैसे पता?
हो सकता है कोई बच्चा इस गेंद को देख सिर्फ खेलने का ही सोचे. कोई बूढा इस के साथ कोई एक्सरसाइज करने का सोचे, होती हैं एक्सरसाइज, बॉल से फिजियो थेरपी में. और हो सकता है कोई यह सोचे कि ज़रूर हम से पहले कोई इंसान यहाँ आया होगा, आस-पास कोई और इंसान मौजूद हो सकता है, चूँकि बॉल तो इंसानी मौजूदगी की निशानी है. या फिर कुछ भी और कोई भी और सोचे. यह कि गेंद बनाई किस ने होगी यही सोचे, यह सिर्फ आप सोच रहे हैं.
खैर, मिसाल ही गलत नहीं हैं, नतीजा भी गलत है. आगे आप ने कहा कि कायनात को बाल जैसी imagine करें तो इसे किसी ने तो बनाया होगा. आप का क्या, सभी आस्तिकों का एक बड़ा तर्क यह होता है.
नहीं बनाया. चूँकि बनाया तो फिर उस बनने वाले को भी किसी ने बनाया. हो सकता है दो नंबर या चार नम्बर वाला खुदा असली हो, और हो सकता है तीन नम्बर या पाँच नंबर वाला खुदा असली हो, या फिर कोई और, या फिर कोई भी नहीं. कैसे साबित करेंगे? जहाँ आप रुके वहीँ क्यों रुके? और एक कदम आगे रुकने की बजाये एक कदम पीछे ही रुक जाते. जावेद साहेब ने भी इस पॉइंट को डिबेट में कहा.
"CONTINGENCY ARGUMENT"
Contingency Argument दिया मुफ़्ती जी ने. दलील यह है, हर चीज़ के पीछे कोई और चीज़ है जिस पर वो डिपेंडेंट हैं. राइट? ठीक है तो फिर आप के खुदा के पीछे भी कोई और है, जिस पर खुदा डिपेंडेंट हैं. कन्टिजेन्सी. खुदा, गॉड कैसे बिना किसी आधार के, बिना किसी कारण के, बिना किसी और अस्तित्व के सहारे के अस्तित्व में हैं? अगर खुदा निराधार, निराकारण है तो कायनात क्यों नहीं?मुफ़्ती जी, आप ने कहा कि पहले पीछे का सवाल ही नहीं है चूँकि खुदा टाइम से पार है, अलग है. जावेद जी ने इसी के जवाब में कहा कि जब खुदा था तो फिर कैसे कहें कि तब कुछ नहीं था. और जनाब जब खुदा था तो समय तो था न, बिना समय के कहीं कुछ होता है क्या? दलील देते हैं कि बिना बनाने वाले के कुछ कैसे हो सकता है यानि अगर बॉल है तो बनाने वाला भी होगा तो फिर समझ लीजिये कि बिना समय के भी बनाने वाला नहीं हो सकता, जब वो है तो समय भी है, बिना समय के भी कुछ नहीं होता. एक मिसाल दे दीजिये कि बिना समय के धरती पर कुछ होता हो.
"NECESSARY BEING ARGUMENT"
कायनात केअस्तित्व के लिए कोई तो होना चाहिए कारण.
वो कौन चित्रकार है, वो कौन चित्रकार है. राइट?
और वही है नेसेसरी बीइंग. राइट?
लेकिन नेसेसरी बीइंग का जो लॉजिक है इसे ज़रा सा शीर्षासन करवा दो और कहानी खत्म, फिर नेसेसरी बीइंग के लिए भी तो नेसेसरी बीइंग चाहिए. और यह सिलसिला कहाँ खत्म होगा, पता नहीं. बड़े-बड़े शब्द. Infinite Regress. Necessary Being. Contingency. लेकिन कुल तर्क वही है सदियों पुराना. कोई तो है जिस ने बनाया कायनात को, कोई तो है जो चला रहा है, कोई तो है जो हमें ज़िंदा रखे है, कोई तो है जो हमें मार देता है.
तर्क घूम-फिर कर यही हैं.
गोल-गोल घूमते रहेंगे कोई सिरा नहीं मिलेगा. फर्क बस इतना है कि कुछ अंग्रेजी टर्म प्रयोग की हैं श्रीमन मुफ़्ती जी ने, लेकिन तर्क, दलील थोड़ा न बदल गए इन से. दलील आज भी यही है कि कायनात है बनाने वाला, चलाने वाला कोई है. कायनात है तो यह किसी पर डिपेंडेंट है, बस वही खुदा है.
और तर्क है आस्तिकों का, "Infinite Regress सम्भव नहीं है, चूँकि परिणाम/Effetc (कायनात) मौजूद है तो कारण/Cause (खुदा ) भी होगा ही, Infinite Regress में इस परिणाम/Effect का कभी नंबर आएगा ही नहीं, नंबर आया है तो कहीं न कहीं से आया है."ठीक है, गुड. तो मैं पूछना चाहता हूँ, कि आप को कैसे पता कि कारण/Cause नंबर एक ही खुदा है, कारण नंबर दो या तीन या फिर चार कैसे नहीं? आप कारण नंबर एक पर कैसे रुके? आगे क्यों नहीं गए? और फिर आगे गए ही क्यों ? पीछे कायनात पर ही क्यों नहीं रुक गए?
हर भेड़ की एक माँ होती है, लेकिन भेड़ों के पूरे झुंड की कोई माँ नहीं होती। अब मान लो कि हर चीज़ निर्भर (contingent) है, हर परिणाम का कोई कारण होता है। लेकिन ब्रह्मांड (Universe) स्वयं निर्भर नहीं है, उसका कोई कारण नहीं है — जैसे भेड़ों के झुंड की कोई माँ नहीं होती। इसलिए ब्रह्मांड को किसी "अनिवार्य सत्ता" (Necessary Being) या ईश्वर की ज़रूरत नहीं है।
कुछ भी वास्तव में "बनाया" नहीं गया (nothing got created ever) , केवल चीज़ें अलग-अलग रूप में जुड़ी (everything is assembled) हैं। इसलिए कोई सृष्टिकर्ता/ creator नहीं है। कोई भगवान नहीं है।
कुछ प्रकार के घोंघे और चपटे कृमि Self-fertilization करते हैं। मतलब ये मेल-फीमेल दोनों रोल खुद ही अदा करते हैं. क्या यह चमत्कार नहीं? क्या ऐसा कहीं भी और हम देखते हैं? नहीं न. तार्किक रूप से तो ऐसा होना ही नहीं चाहिए, लेकिन ऐसा होता है. उसी तरह से आम बुद्धि से ऐसा लगता है कि जब हरेक रचना का का कोई रचियता है तो इस कायनात का भी कोई रचयिता होना चाहिए, लेकिन चमत्कार! ऐसा ज़रूरी नहीं है. यह ब्रह्माण्ड का रचयिता ज़रूरी नहीं है. ठीक वैसे ही जैसे उन घोंघों या कीड़ों को गर्भ-धारण करने के लिए अलग से किसी और प्राणी की ज़रूरत नहीं है. आशा है मेरी बात समझ में आई होगी.
नेसेसरी बीइंग और कंटिंजेंट बीइंग ये बस शब्द हैं, फ़लसफ़ी किस्म के शब्द और कुछ भी नहीं. पहली बात, कैसे पता कि कायनात का हर अस्तित्व दूसरे किसी अस्तित्व पर निर्भर है ही. क्या हम ने सारी कायनात, कायनात का ज़र्रा-ज़र्रा चेक कर लिया?
कल तक हम पदार्थ के बारे में कुछ और समझते थे, आज कुछ और. आज हम पदार्थ को ऊर्जा का ही रूप समझते हैं.
कल तक हमें कहां पता था कि पौधे भी सांस लेते थे लेकिन जगदीश बसु ने बताया न कि पौधे भी ज़िंदा हैं.
क्या पता हमें कल पता लगे कि सारी कायनात ही ज़िंदा है और एक दूजे पर निर्भर है. इंटरडेपेंडेंट हैं. या इंडिपेंडेंट है?
वैसे जावेद साहेब ने डिबेट के अंत में एक नौजवान को इस लिए डांट दिया था कि पत्थर कैसे दर्द सह सकते हैं, लेकिन मुझे लगता है कि कभी यह भी साबित हो सकता है कि पत्थर भी दर्द महसूस करते हैं. किस को पता?
क्या पता कल पता लगे कि विज़िबल दुनिया के नीचे -अंतर्-तले कुछ ऐसा है जो सब का आधार है और वो निराकार है और साकार को सब तरफ घेरे हो, साकार के अंदर निराकार ही छुपा हो?
किस को पता?
या फिर यह क्यों न माना जाये कि हमें तो अभी कुछ ठीक-ठीक समझ नहीं आ रहा माजरा क्या है, जब समझ आएगा तब देखा जायेगा?
और मान लो कि आस्तिक लोग "अनिवार्य सत्ता" (Necessary Being) को सिद्ध भी कर दें, तो यह कैसे साबित होगा कि वही "अनिवार्य सत्ता/ necessary being" उनका भगवान है?
अगर आप मान लेते हैं कि खुदा ही है जो अनंत है, अकाल है, समय से परे तो आप यह क्यों नहीं मानते कि यह कायनात ही अनंत है और अकाल है, जिस में सब लीला हो रही है. नृत्य की तरह, एक्टिंग की तरह, जहाँ कृति और कृत्य एक दूजे में ही हैं. अलग-अलग नहीं हैं.
चलिए, खुदा शब्द को ही देख लेते हैं, यह तो खुद कह रहा है कि जो खुद बना है, स्वयं-भू. लेकिन दिक्कत यही है कि आप खुदा को तो मान लेते हैं कि यह स्वयं/ खुद बना है, लेकिन कायनात को खुदा मानने से इंकार कर देते हैं.
इस कायनात में हर चीज़ एक-दूजे पर निर्भर है, होता रहे हर जगह इफ़ेक्ट का कॉज, होती रहे हर चीज़ किसी दूसरी चीज़ पर डिपेंडेंट, लेकिन कायनात, इस कुदरत, इस अस्तित्व का कोई कॉज नहीं है. यह ऐसे ही है. इसीलिए इसे लीला कहा गया है, यह बस एक खेला है, इस में कोई तर्क नहीं, किसी "क्यों" का कहीं जवाब नहीं.
वृक्ष हरे क्यों हैं, इस में अलाँ-फलाँ केमिकल है लेकिन वो ही केमिकल क्यों है, किसे पता है? इस का कोई जवाब नहीं. अंततः किसी भी "क्यों" का कोई जवाब नहीं है. यह बस इस कुदरत, इस कायनात, इस अस्तित्व का खेल है, लीला है, और यह बस ऐसे ही है. इसे किसी नेसेसरी बीइंग की ज़रूरत नहीं है. कोई अलग से नेसेसरी बीइंग है ही नहीं. इस अस्तित्व से बाहर कोई अलग से अस्तित्व नहीं है.
संभावना है कि जो जाहिर है उसे के नीचे जो ज़ाहिर नहीं है उस का ताना-बाना है. साकार के भीतर ही निराकार है. और निराकार के भीतर ही साकार है. अब वो निराकार है यह भी पक्का-पक्का कहना गलत है. बस है साकार के नीचे कुछ है जो हमारे लिए एक दम से ज़ाहिर नहीं है. बस.
कौन हमें जगाता है, कौन सुलाता है, कौन जन्म देता है, कौन मारता है, पीछे जो भी है, वो हम से अलग नहीं है. अलग दीखता है चूँकि हमारी सीमाएं हैं, हम उन सीमाओं से बंधे हैं, चूँकि तमाम कमियों के बावज़ूद हमें सिस्टम भी दीखता है, इंटेलीजेंट डिज़ाइन भी दीखता है, इसलिए हमें कोई अलग से शक्ति, पावर का अहसास होता है, जिसे धर्मों ने अपने-अपने हिसाब-किताब से इंसान पर थोपा है, उस की आत्मा, उस के विवेक पर कब्जा करने का टूल की तरह प्रयोग किया है, समाज के नियम-कायदे-कानून उन मान्यताओं के इर्द-गिर्द खड़े कर दिए हैं.
लेकिन यह इंटेलीजेंट डिज़ाइन के पीछे क्या है, कोई नहीं जानता. जब नहीं जानता तो थोपना किस लिए? लेकिन ज़्यादातर धर्मों को थोपना होता है. यही गलत है.
एक संभावना व्यक्त करता हूँ. ऑटो स्टीरियो-ग्राम देखे हों शायद आप ने. एक नज़र में तस्वीर कुछ और होती है लेकिन थोड़ा गहरा देखो तो तस्वीर में कोई और तस्वीर दिखती है."लोका जानि न भूलौ भाई।
खालिक खलक खलक मैं खालिक, सब घट रहौ समाई ॥टेक॥
अला एकै नूर उपनाया, ताकी कैसी निंदा।
ता नूर थै सब जग कीया, कौन भला कौन मंदा ॥
ता अला की गति नहीं जाँनी गुरि गुड़ दीया मीठा ॥
कहै कबीर मैं पूरा पाया, सब घटि साहिब दीठा ॥"
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"ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਫਰੀਦਾ ਖਾਲਕੁ ਖਲਕ ਮਹਿ ਖਲਕ ਵਸੈ ਰਬ ਮਾਹਿ ॥
ਹੇ ਫਰੀਦ! (ਖ਼ਲਕਤ ਪੈਦਾ ਕਰਨ ਵਾਲਾ) ਪਰਮਾਤਮਾ (ਸਾਰੀ) ਖ਼ਲਕਤ ਵਿਚ ਮੌਜੂਦ ਹੈ, ਅਤੇ ਖ਼ਲਕਤ ਪਰਮਾਤਮਾ ਵਿਚ ਵੱਸ ਰਹੀ ਹੈ।
ਮੰਦਾ ਕਿਸ ਨੋ ਆਖੀਐ ਜਾਂ ਤਿਸੁ ਬਿਨੁ ਕੋਈ ਨਾਹਿ ॥੭੫॥"
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Also Read भगवान
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"जावेद साहेब का सेक्स के प्रति नेगेटिव नज़रिया"
एक जगह जावेद साहेब कहते हैं कि इंसान एक "बेहूदा" काम से पैदा हुआ है. बेहूदा? मतलब सेक्स कोई बेहूदा काम है? यह सेक्स के प्रति एक बेहद बेहूदा सोच है. सेक्स बेहूदा नहीं है, हमारे समाज ने इसे बेहूदा बना दिया. हमारे समाज ने सेक्स को गाली बना दिया. हमारी सब बेहूदा और भद्दी गालियां सेक्स से जुड़ी हैं. हम ने सेक्स को गंदा और बेहूदा बनाया है अन्यथा सेक्स तो कोई भी शारीरिक क्रिया की तरह एक सामान्य क्रिया है."प्रॉब्लम ऑफ़ ईविल/ Problem of Evil पर बहस "
"प्रॉब्लम ऑफ़ ईविल" पर बात करते हुए मुफ़्ती साहेब कहते हैं कि गुड को डिफाइन करने के लिए ईविल का होना ज़रूरी है. बिना बुराई के, ईविल के आप अच्छाई को समझेंगे कैसे? यह क्या लॉजिक है. जावेद साहेब ने धोया भी था इस तर्क को.
क्या जिन समाजों में रेप, क़त्ल नहीं हैं या कम हैं तो क्या वहां यह सब बढ़ा दें ताकि उन को अहसास हो कि अच्छाई क्या है?
जहाँ अमीरी है तो उन को गरीब कर दें ताकि उन को गरीबी का दुःख पता लगे और फिर अमीरी का सुख क्या है, यह समझ आये?
नहीं.
ठीक है, कंट्रास्ट से ही इंसान वैल्यू बेहतर समझता है लेकिन इस तरह के कंट्रास्ट की कोई ज़रूरत है नहीं.
हम बिना इस तरह की ईविल के भी गुड को समझ सकते हैं. कैसे? आप ने बच्चे को सिखाना है कि बिजली का करंट खाने से मर जाते हैं, यह समझने के लिए क्या ज़रूरी है कि उसे करंट लगाया ही जाये? पोटाशियम साइनाइड को खा के देखा जायेगा कि वो कितना घातक है?
सर दर्द हुआ आदमी समझ जाता है लेकिन कैंसर हो सर में, जुकाम हुआ ओके, लेकिन टीबी हो जाये इतना कंट्रास्ट? यह समझ से परे है.
मैंने कल सड़क से घायल को, बेहोश को उठा के अपनी कार में अस्पताल पहुँचाया है. क्या मुझे समझ नहीं उस के दर्द की.
असलियत यह है कि अस्तित्व ने जिस भी तरह से घटित होना था, वो हुआ है. उस में अच्छा-बुरा, हरेक ने अपने आप से ही Define करना है. शेर के लिए, उस के बच्चों के लिए हिरन को मारना अच्छा है, हिरन के लिए शेर बुरा है, चूँकि वो उसे खा जाता है. कुदरत के लिए कुछ अच्छा बुरा नहीं है. उस के लिए यह साइकिल ही सही है. इंसान के साथ भी ऐसा ही है. जब यह कुदरत के साइकिल में पंगे लेता है, तो कुदरत बदला लेती है, वो इसे सबक सिखा देती है. बाकी इंसान को खुद से तय करना है कि क्या अच्छा है और क्या बुरा है. और उस के लिए यह ज़रूरी नहीं है कि क़त्ल, बलात्कार, गरीबी, मार-काट हो ही. इंसान इतना समझदार है कि वो बिना इस सब के भी इन की बुराई समझ सकता है.
न्याय में देरी न्याय से इनकार के समान है। यदि किसी लड़की का बलात्कार होता है और उसे आखिरत के दिन न्याय का आश्वासन दिया जाता है, तो यह देरी न्याय नहीं है। इसलिए आखिरत की अवधारणा ही त्रुटिपूर्ण है।
फ्री-विल दे दी उस कुदरत ने, और फ्री-विल भी एक दम फ्री नहीं है तुम साँस एक हद तक रोक सकते हो, तुम एक पैर पर खड़े हो सकते हो कुछ देर, फिर पैर ज़मीन पर टिकना ही पड़ेगा. फिर साँस लेना ही पड़ेगा. और यह फ्री-विल कुछ हद तक सब प्राणियों में है, इंसान तक आते-आते सब से ज़्यादा है, इतनी ज़्यादा कि वो Atom Bomb का प्रयोग कर के खुद को, पृथ्वी को खतम कर दे, निर्जन कर दे.
पशु शब्द का अर्थ है जो "पाश" में बंधा है. मनुष्य शब्द मानस और मनन से जुड़ा प्रतीत होता है, जो मनन कर सकता है, वो मानस है. लेकिन अधिकाँश धर्म चाहते हैं उस के मनन पर अपनी किताब थोपना. मनन हो चुका. हज़ारों, सैकड़ों साल पहले और यह रही किताब. इस के हिसाब से जीयो. इस्लाम सब से बड़ा दावेदार है आज भी इस बात का. बात खत्म. बस यही झगड़ा है. पूरी दुनिया में झगड़ा है.
"प्रार्थना/ अरदास/ इबादत/ Prayer का असर"
मेरा गणित कहता है कि सब प्रार्थनाएं व्यर्थ हैं........कव्वों की कांव कांव से अगर ढोर मरने लगें तो सारा गाँव श्मशान हो जाए.....न
न....कुदरत/परमात्मा/खुदा का अपना एक चक्कर है............वो कभी हमारी प्रार्थनाओं, अरदासों, मन्नतों के चक्कर में नहीं पड़ती/पड़ता.....वो कभी उस चक्कर में हस्तक्षेप नहीं करती/करता.
आप नाम छोड़ दीजिये.....ये नाम परमात्मा, ईश्वर, भगवान इन्हें छोड़ देते हैं.....नाम सब काम-चलाऊ हैं.....नाम सब हमारे दिए हैं......यूँ समझ लीजिये कि ब्रह्माण्ड को अवचेतन से और ज़्यादा चेतन होने का फितूर पैदा हुआ.......उसने अपने लिए कुछ रूप गढ़ने शुरू किये.....खुद ही कुम्हार, खुद ही मिटटी, खुद ही पानी, खुद ही मूरत......बस जैसे-जैसे वो रूप गढ़े, उनमें रूप के मुताबिक़ चेतना घटित होती गई......यूँ ही इन्सान तक पहुँच हो गई......यूँ ही सब पैदा हुआ...इस सब का सिवा खेल-तमाशे के और क्या मन्तव्य? सो कहते हैं कि जगत जगन्नाथ की लीला है.
जादूगर जानते हैं कैसे करता है जादू? जिस हाथ से उस ने करामत दिखानी है, वो तो आप से ओझल कर देता है और दूसरे हाथ से कोई एक्टिविटी दिखाता रहता है, ताकि आप का सारा ध्यान सिर्फ एक्टिव हाथ पर ही रहे और इतने में ही ओझल हाथ से, वो करामात कर देता है. वही करते हैं ये धर्म. वो कौन चित्रकार है? चित्र है तो चित्रकार भी होगा? लेकिन चित्र ही क्यों हैं, नृत्य क्यों नहीं? चूँकि नृत्य बोलेंगे तो सारा व्यापार धराशाई हो जायेगा. ओझल हाथ सामने आ जायेगा तो सारी करामात धराशाई हो जाएगी. फिर क्या ज़रूरत मंदिर की, मस्जिद की? फिर तो सारी कायनात ही मंदिर है, मस्जिद है? कहा नहीं था गुरु नानक ने कि सारा नभ थाल है और तारिका मंडल दीपक हैं. लेकिन कहाँ समझा के राज़ी है जादूगर, और क्यों समझाएगा?
"तैंतीस करोड़ देवी-देवता"
चलिए थोड़ी देर के लिए एक संभावना पर विचार करते हैं, मान लेते हैं कि कायनात को बनाने वाला कोई है तो मुझे लगता है कायनात एक खुदा ने अकेले बनाया हो ऐसा शायद न हो. मतलब God ने gods & goddesses की मदद ली.
मिसाल के लिए जैसे कंप्यूटर किसी एक ने नहीं बनाया, किसी ने बिजली बनाई, किसी ने कैलकुलेटर, किसी ने टेलीविज़न, किसी ने स्पीकर, किसी ने माइक,
इस तरह से सब मिला जुला के एक चीज़ बनी कंप्यूटर.
ऐसे ही वरुण देवता, वायु देवता, धरती माता आदि ने मिल कर जीवन बनाया।
जैसे आप किसी इंसान से दोस्ती बना के उस से मदद ले सकते हैं ऐसे ही आप जानवर से भी दोस्ती बना सकते हैं.
ऐसे ही पेड़-पौधे से. हाँ, पेड़ पौधे भी जान रखते हैं, भावनाएं समझते हैं.
सच में. अब आगे यह साबित होगा कि जल, पत्थर, मिटटी सब में कुछ चेतना है.
जी, यदि नहीं तो बिना चेतना के चेतना आई कैसे?
आप ने देखा होगा, कथा कीर्तन में जो जल कीर्तन-कर्ता के पास रखा जाता है, उसे भी पवित्र समझा जाता है. जल भी चार्ज किया जा सकता है, मंत्र से फूंका जाता है.
मुझे लगता है यह सब ऐसे ही नहीं है. वरुण देवता का आह्वान यह ऐसे ही नहीं है. तो जैसे हिन्दू धरती को माता, सूर्य को देवता, हवा को देवता यह सब मानते हैं, शायद यह ग़लत नहीं है.
तो क्या इन सब के पीछे जो चेतना है, उसे डायरेक्ट एप्रोच नहीं किया जा सकता? मुझे लगता है नहीं. वो निरपेक्ष है. वो किसी की इबादत, आह्वान, प्रार्थना से प्रभावित होने वाला नहीं है. जैसे कोई जज. उसे प्रभावित होना चाहिए क्या किसी वकील से, किसी litigant से? नहीं न. ठीक वैसे ही.
लेकिन हाँ, आप अपनी फ्री-विल का प्रयोग कर के कायनात में किसी को भी अपने पक्ष में करने का प्रयास कर सकते हो. किसी भी इंसान को, जानवर को, पेड़ पौधे को, जल को, वायु को, पृथ्वी को, like that.
तो हिन्दुओं का यह कांसेप्ट वरुण देवता, वायु देवता, धरती माता.........यह सही है क्या? शायद हाँ.
तो एक अल्लाह, एक गॉड की बजाय करोड़ों देवी-देवता की इबादत का कांसेप्ट सही है क्या? शायद हाँ. मेरा मतलब यह है कि God की इबादत कोई काम की नहीं चूँकि God निरलेप है, निरपेक्ष है लेकिन gods & godesses की इबादत फिर भी काम आ सकती है. शायद.
"मेरा निष्कर्ष"
संभावना है कि सब माया है. अस्तित्वहीनता से अस्तित्व तक. अस्तित्व से अस्तित्वहीनता तक. दोनों लीन-विलीन। समय है और नहीं भी. सब माया है. साकार और निराकार दोनों मिश्रित-एक दूजे में-लीन-विलीन. नेति नेति।। कृति और कर्ता मिश्रित-एक दूजे में-लीन-विलीन। अद्वैत!!! एक नहीं एक-अंत. एक का भी अंत. एकांत. वेद नहीं वेदांत. वेद का भी अंत. ज्ञाता का अंत। ज्ञान का अंत...वेदांत."खुदा को साबित करने की ज़िम्मेदारी किस की"
अब अगला पॉइंट. खुदा है या नहीं, यह साबित करने की जिम्मेदारी किस की है. जो कहता है कि "है". कोर्ट में किसी भी अपराध को साबित करने की जिम्मेदारी किस की है, जो आरोप लगाता है.
ठीक है डिफेन्स में आरोपी भी अपने तर्क, अपने सबूत देता है, लेकिन बिना शंका के अपराध या क्लेम साबित करने की प्राइमरी ज़िम्मेदारी आरोप लगाने वाले की, क्लेम करने वाले की है. अगर क्लेम करने वाला क्लेम ही न करे, अगर आरोप लगाने वाला आरोप ही न लगाए तो सामने वाले को क्या पड़ी है साबित करने कि उस के कोई ऊपर कोई क्लेम या दावा नहीं बनता.
अगर सुबह-शाम मंदिर मस्जिद न क्लेम करें, यदि धर्म-मज़हब न क्लेम करें कि कोई खुदा भगवान हैं और वो उस के रजिस्टर्ड एजेंट हैं, अड्डे हैं तो क्या ज़रूरत किसी को उन को झुठलाने की. किसे परवा कि खुदा है कि नहीं. इंसान के सिवा पूरी कायनात बिना गॉड की परवा किये चल ही रही है.
तो पहली ज़िम्मेदारी क्लेम/ दावा करने वाली की है. डिफेन्स करने वाला भी अपने तर्क दे सकता है, अपनी राय दे सकता है कि खुदा नहीं है तो कैसे नहीं है या खुदा वैसा नहीं है जैसे आप समझते हैं या खुदा है या नहीं उस का ठीक से पता नहीं है या उस का ठीक-ठीक पता नहीं किया जा सकता या पता लग भी गया तो उसे बताया नहीं जा सकता या कुछ भी और. But the "Burden of Proof" is primarily upon the claimant. Simple.
और किस ने बना रखे हैं मंदिर-मस्जिद? बिना धार्मिक किस्म के लोगों के, सुबह-शाम कौन घोषणाएं करता है गॉड की?
तुम्हें क्या चिंता करनी कि नास्तिक साबित कर पाए, न कर पाए कि गॉड है या नहीं है. तुम अपना साबित करो न दावा, यह नास्तिक के पीछे काहे छुप रहे हो?
सदियों तक तुम ने नास्तिक की परवा की क्या? वाल्मीकि रामायण में नास्तिक को चोर कहा, गया है और इस्लाम में तो नास्तिकता की गुंजाइश ही नहीं, मृत्यु का विधान है और यहाँ कहा जा रहा था कि नास्तिक साबित करे अपना दावा।
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"Does God Exist? डिबेट करने-करवाने के पीछे संभावित कारण"
मुझे लगता है कि झगड़ा इस बात का है मात्र कि अधिकांशतः धर्म-मज़हब-दीन ने जिस तरह से उस चेतना की समझ को, अपने अपने वर्ल्ड-व्यू को दुनिया पर थोप रखा है, वो सही है या नहीं. इंकार इस बात का है. किसी ने तो यहाँ तक थोप रखा है कि नहीं, सिर्फ उसी का version सही है बाकी सब गलत हैं और ऐसा ही यह मुफ़्ती साहेब भी एक वीडियो में कहते नज़र आ रहे हैं कि इस्लाम ही सही है बस. बाकी सब गलत. आज यही झगड़ा है मुख्यतः. सब धर्म बैक-फुट पर आ गये हैं, आते नज़र आ रहे हैं. इस बहस से बैकफुट पर खड़े रिलिजन फिर से फ्रंट-फुट पर आ सकें, यह प्रयास किया गया. ख़ास कर के इस्लाम, जो कि X -मुस्लिम की आँधी को झेल रहा है.
बाद में मुफ़्ती साहेब यह कहते हुए पाए गए कि वो तमाम लोगों की तरफ से बहस कर रहे थे जो गॉड के अस्तित्व को मानते हैं. नहीं, यह झूठ है. इस्लाम सिवा मुसलमान के किसी भी और तरह से गॉड को मानने वालों की मान्यता को सही मानता ही नहीं। यह भी मुफ़्ती साहेब कह चुके हैं.
"Does God Exist? डिबेट के फ़ायदे"
डिबेट को organise करने में कमियाँ थी, methodology में कमियाँ थीं, जो मैंने पहले ही लिखीं लेकिन मुझे नहीं लगता डिबेट कोई नूरा कुश्ती थी, नकली थी, न. डिबेट असली थी, जावेद साहब के उम्र की वजह से, उत्तेजना की वजह से हाथ काँप रहे थे,
उन्होंने विज्ञान/ फलसफे के अलफ़ाज़ न समझने के लिए माफी भी मांगीं।दीन-धर्म बस जन्म से ही बच्चे को दिए जाते थे, अब कम से कम सब बहस तो करेंगे, खुद से बहस तो करेंगे. तो यह है इस तरह की बहस की जीत. बहस में कौन जीता, कौन हारा यह तय नहीं होगा, न हो पाएगा, लेकिन जनता जीती, यह तय है. चूँकि गॉड से धर्म खड़े हैं और धर्मों से राजनीति और राजनीत्ति से जुड़ी हैं हमारी ज़िन्दगी. तो फर्क तो पड़ेगा. हालाँकि मैं सहमत नहीं हूँ लेकिन ऐसा कहा है किसी ने और बहुत बढ़िया कहा है कि बढ़िया बहस वही कि जिस में अंत तक नास्तिक आस्तिक हो जाए और आस्तिक नास्तिक बन जाये.


“Does God Exist?”
ReplyDeleteइस डिबेट का शीर्षक ही भ्रामक है. बहस ‘God’ पर हो रही है लेकिन तर्क अल्लाह पर दिये गये. यह स्पष्ट होना चाहिए था कि चर्चा किस पर है, विशेष रूप से जब डिबेट में मुस्लिम शामिल हैं, सार्वभौमिक ईश्वर पर या इस्लामिक ईश्वर पर. डिबेट की संरचना, शब्दावली और ऑडियंस चयन भी एकतरफा थे, इस्लामिक.
फिर जब विज्ञान को ही सीमित कर दिया गया तो अक्ल की बात रह ही नहीं गई. कायनात है, तो बनाने वाला होगा. लेकिन यही प्रश्न है कि बनाने वाला है तो कारण क्या है और कारण का कारण क्या है और फिर उस कारण का कारण. खुली बहस में सब उपस्थितजन हिस्सा लेते और निष्कर्ष अपने आप निकल कर आना चाहिये, जो कि सबकी समझ में आये और स्पष्ट हो. ना कि मुफ्ती साहब सब तय करें. दरअसल ये बहस थी ही नहीं. पता नहीं इसको डिबेट कहा ही क्यों गया.