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Showing posts from March, 2026

असल में खेला है क्या? यह लीला है क्या आख़िर? पढ़िए हिंदी और अंग्रेज़ी जैसे भी.

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ईश्वर है नहीं — ईश्वर हो रहा है ईश्वर/गॉड कहीं बैठा हुआ नहीं है। ईश्वर घटित   हो रहा है—हर पल, हर घटना में। अब सवाल यह है कि क्या वो वैसे सुनता है जैसे लोग समझते हैं कि वो सुनता है?  उन के दुखड़े। और जवाब भी देता है, उन की प्रार्थनाओं का।  जैसा वो समझते हैं. उन के विघ्न हरता हैं, दुःख-दर्द-कलेश निवारण करता है.  नहीं। ईश्वर कोई आपका सर्विस प्रोवाइडर नहीं है कि आपने प्रार्थना की और उसने आपका काम कर दिया। उसकी विशालता और गहराई आपको अभिभूत कर सकती हैं, लेकिन वो वैसे काम नहीं करता जैसा लोग सोचते हैं। शायद वो मैक्रो मैनेजमेंट करता है—जैसे जन्म, मृत्यु, प्रकृति का संतुलन, और ज़रूरत पड़े तो प्रजातियों का संरक्षण। कुछ ऐसा। लेकिन वो माइक्रो मैनेजमेंट नहीं करता—जैसे आपकी बेटी की शादी करवाना, आपको नौकरी दिलाना, या आपकी बीमारी ठीक करना। नहीं। वो सब असल में आपकी आस्था करती है, ईश्वर नहीं। इसलिए असली सवाल यह होना चाहिए कि क्या भगवान आपकी प्रार्थना सुनता है और उसी हिसाब से प्रतिक्रिया देता है या नहीं। अगर वो मदद ही नहीं करता, तो फिर इससे क्या फर्क पड़ता है कि वो है या नहीं?...

ताज़ा क़लाम

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X-मुस्लिम ‘X-मुस्लिम’ क्यों कहलाते हैं खुद को? आप को इस्लाम छोड़ के बाहर हुए लोग अपने नाम के आगे X-मुस्लिम लगाए दीखते हैं, किसी और रिलिजन के लोग ऐसा क्यों नहीं करते? सीधा जवाब है, बाकी रिलीजन के लोगों को कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ता कि आप उनके रिलीजन के अंदर हो के बाहर। इस्लाम एक गिरोह की तरह है.   जी. मैंने तो "गिरोह" शब्द प्रयोग करते देखा है मुस्लिमों को इस संदर्भ में. अगर ऐसा न होता तो आपको इस्लाम छोड़कर बाहर हुए लोग मुंह छिपाए नज़र न आते. क्यों? चूँकि उन्हें पता है, इस्लाम से बगावत मतलब मौत. इसीलिए हमें X-मुस्लिम तो दिखते हैं X-हिन्दू, X-सिख या X-बौद्ध नहीं। क्या हिन्दू मनुस्मृति से चलते हैं जैसे मुस्लिम क़ुरआन से? अगर कोई हिन्दू या कोई भी गैर-मुस्लिम कह दे कि देश क़ुरआन से नहीं, संविधान से चलेगा — तो तुरंत जवाब आता है: “देश मनुस्मृति से भी नहीं चलेगा।” अब इन महान बुद्धिजीवियों से कोई पूछे — पहली बात, कौन हिन्दू कह रहा है कि देश मनुस्मृति से चलना चाहिए? और दूसरी बात, देश मनुस्मृति से चला कब था? भारत में तो हमेशा अलग-अलग राजा हुए, अलग-अलग तरीके से राज हुआ। कोई एक किताब पकड़कर सबने श...

जंग के साये में इंसानियत: क्या धर्म और राष्ट्र की सीमाएँ हमारा भविष्य खा जाएँगी?

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पाकिस्तान-अफगानिस्तान युद्धरत हैं. इजराइल-फिलस्तीन युद्धरत हैं. रूस-उक्रेन युद्धरत हैं. अब अमरीका और इजराइल मिल कर ईरान के साथ युद्धरत हैं. अभी पीछे कम्बोडिया और थाईलैंड भी युद्धरत थे. छोटी-मोटी मार-काट चलती ही रहती है लेकिन उस छोटी-मोटी मार-काट में हज़ारों लोग मर-कट जाते हैं. यह है हमारी दुनिया. हम अपने भोजन के लिए मुर्गे, बकरे, मछली तो मारते-काटते ही हैं लेकिन अपनी खोखली समझ की वजह से एक दूजे को भी मारते काटते आ रहे हैं सदियों से. यह है हम. इंसान। कुदरत का बेहतरीन शाहकार। खुदा का सर्वश्रेष्ठ नमूना। दुनिया में गोरे-काले, ऊंचे नीचे, अमीर-गरीब, औरत-मर्द, सब में फर्क है. यह है हमारी दुनिया। ऊपर से हम एटम बम भी बना कर बैठे हैं. ऊपर से हमारे हुक्मरान। वल्लाह। माशाल्लाह। इलाज क्या है? पहले तो समझ लो यह दुनिया इसी तरह से बहुत देर तक चल नहीं पायेगी। हमारी अगली पीढ़ियाँ शायद ही इस धरती पर आ पाएँ। हद मार के एक या दो. क्यों? चूँकि वक्त के साथ-साथ मूढ़ता बढ़ती जा रही है. बर्बादी के साजो सामान बढ़ते चले जा रहे हैं. इलाज क्या है? सब धर्मों को विदा करो. नहीं चाहिए। इन की वर्ल्ड वाइड बहस करवाओ, लम्ब...

इवेंट बाजी

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हम  सब  इवेंट बाज  हैं  आप ने सुना होगा मोदी सरकार हर मौके को एक इवेंट बना देती है. इवेंट बाज हैं मोदी. वो हैं, लेकिन इवेंट बाज सिर्फ मोदी सरकार ही नहीं है, लगभग सभी हैं. अपनी-अपनी औकात के हिसाब से.  शादी क्या है? एक आदमी और एक औरत ने सेक्स की रज़ामंदी कर ली, साथ-साथ रहने को राज़ी हो गए. हुआ तो बच्चे पैदा करेंगे.  गुड. लेकिन इस के लिए पूरी दुनिया  को बुला कर आयोजन करने का क्या मतलब? लेकिन करेंगे. कई-कई दिन करेंगे. "चाहे पल्ले नहीं धेला,  फिर भी करदी मेला-मेला". तमाम रिश्तेदारों को बुलाया जाता है. रूठों को मनाया जाता है. फूफा, जमाता जो सदियों से  नाराज़ हैं  सब को एक बार तो बुला ही लिया जाता है बाद में चाहे फिर से नाराज़ हो जाएँ.    ड्राइवर तो रहता ही है, ड्राइवर का परिवार भी हाजिर होता  है.    कब्र में जिनकी टाँगे हैं वो भी इत्र-फुलेल लगा कर हाजिर हो जाते हैं. कब्रों से मुर्दे भी उठा लिए जाए अगर सम्भव होता तो. रोका, मँगनी, मेहँदी, हल्दी और पता नहीं क्या-क्या. शादी तक पहुँचते-पहुँचते साँस फूल जाती है.  मेरी ...

नग्नता पुराण

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पूरी कायनात नंगी है. तुम ढके रहते हो, छुपे रहते हो. लगभग हर वक्त छत्तों के नीचे रहते हो. कहते भी हैं, इंसान के सर पर छत ज़रूर होनी चाहिए। होनी चाहिए, कपड़ों में भी रहना चाहिए लेकिन हर वक्त? यह बीमारी है, यह बीमारी का एक बड़ा कारण है. तुम्हारे कपड़े, तुम्हारी छतें बीमारी का कारण हैं.  कभी तो इन्हे छोड़ो भी. कभी तो नंगे होवो, कभी तो बिना छत के रहो. गोरे  पग्गल हैं जो समद्र तटों पर नग्न पड़े रहते हैं. नहीं? कुछ समाजों में औरत लगभग सर से पैर तक ढकी रहती है ता-उम्र. इसे क्या हवा मिलेगी, क्या खुली  धूप  मिलेगी? Also read:-  Does God Exist? Review - जावेद अख़्तर और मुफ़्ती शमाइल की लल्लनटॉप डिबेट का रिव्यु कुछ समाजों में औरत को बाल तक खोलने की इजाज़त नहीं है. ईरान में क्या हुआ? सैकंड़ों औरतें  मार दी गईं सिर्फ़ इसलिए कि उन्होंने अपने बाल ढकने से इंकार कर दिया। क्यों? चूँकि इंसानी चेहरे पर बाल आकर्षण पैदा करते हैं. आज भी यदि कोई गंजों के सर पर बाल उगाने का फार्मूला खोज  ले तो रातों रात धन-कुबेर बन जायेगा।  Also see:-  बागेश्वर बाबा को चैलेंज क्यों है ऐसा? चूँकि...