इवेंट बाजी
आप ने सुना होगा मोदी सरकार हर मौके को एक इवेंट बना देती है. इवेंट बाज हैं मोदी. वो हैं, लेकिन इवेंट बाज सिर्फ मोदी सरकार ही नहीं है, लगभग सभी हैं. अपनी-अपनी औकात के हिसाब से.
शादी क्या है?
एक आदमी और एक औरत ने सेक्स की रज़ामंदी कर ली, साथ साथ रहने को राज़ी हो गए. हुआ तो बच्चे पैदा करेंगे. गुड.
लेकिन इस के लिए पूरी दुनिया को बुला कर आयोजन करने का क्या मतलब?
लेकिन करेंगे. कई कई दिन करेंगे.
"चाहे पल्ले नहीं धेला, फिर भी करदी मेला-मेला".
तमाम रिश्तेदारों को बुलाया जाता है. कब्र में जिनकी टाँगे हैं वो भी इत्र-फुलेल लगा कर हाजिर हो जाते हैं. कब्रों से मुर्दे भी उठा लिए जाए अगर सम्भव होता तो. रूठों को मनाया जाता है. फूफा, जमाता जो नाराज़ हैं सदियों से सब को एक बार तो बुला ही लिया जाता है बाद चाहे फिर से नाराज़ हो जाएँ. ड्राइवर तो रहता ही है, ड्राइवर का परिवार भी हाजिर होता है.
रोका, मँगनी, मेहँदी, हल्दी और पता नहीं क्या क्या. शादी तक पहुँचते-पहुँचते साँस फूल जाती है.
मेरी पत्नी की भतीजी की शादी थी. दो दिन में तीन बार हुयी। पहले आर्य समाज मंदिर में. फिर कोर्ट में. फिर अगले दिन गुरूद्वारे में।
कमाल के लोग हैं हम.
इवेंट-बाज.
कुछ प्रोफेशनल इवेंट-बाज हैं. इन के पल्ले चाहे कख न हो लगाने के लिए. ये लोग अपने गली-मोहल्ले इर्द-गिर्द के लोगों को इकट्ठ कर लेंगे. दान के नाम पर पैसा इकट्ठा करेंगे. इन की पांचों उँगली घी में रहती हैं और सर कड़ाही में. "हींग लगे न फिटकरी, रंग चोखा". मौका कोई हो, उसे उत्सव में बदल दो. उस में धार्मिक तड़का लगा दो. और पैसे इकठे कर लो और जितने बोर्ड-बैनर लगने हैं उन पर अपना चौखटा चिपका दो. और ये बोर्ड बैनर प्रोग्राम के बाद भी महीनों तक इन लोगों को मुफ्त की पब्लिसिटी देते रहते हैं. इवेंट-बाज.
भारत में सारा साल ही इवेंटबाजी चलती रहती है. साईं संध्या, माता की चौकी, जागरण, खाटू श्याम जी का कीर्तन, किसी बड़े प्रोफेशनल बाबा की कथा प्रवचन, राम लीला, दशहरा ........
राम लीला!
यह हिन्दुओ समाज की सब से बड़ी इवेंट है. कई-कई दिन चलती है. हर साल चलती है. एक ही कहानी है, जो बच्चे बच्चे को पता है. सिर्फ हिन्दुओं को ही नहीं, भारत में रहने वाले हर दीन रिलिजन के लोगों को पता है. लेकिन फिर भी चलती है.
रामा नन्द सागर ने रामायण बनाई थी. उस दौर में उतने समय सड़कें खाली हो जातीं थी. लोग टीवी के आगे जम जाते थे. फिर उस के बाद और लोगों ने भी बनाई है राम कथा टीवी पर. बड़े बड़े एक्टर नाटक खेलते हैं रामायण पर. आशुतोष राणा उन में से हैं. क्या है यह सब? इवेंट बाजी! मैं हैरान हूँ एक ही कहानी! एक चटनी को कितना पीसोगे? वो पहले ही पिस चुकी है. राम की कहानी घर-घर कब की पहुँच चुकी है. तर्क क्या है?
आप एक फिल्म कितनी बार देखते हैं? एक बार देखने के बाद शायद ही दुबारा देखने का आप का मन करे. लेकिन रामायण बार-बार देखी जा रही है.
महान लोग. महान मूर्ख लोग.
यह सिर्फ मंद-बुद्धि, बंद-बुद्धि का प्रतीक है. इन्ही मूर्खताओं की वजह से मैं तमाम धर्मों के खिलाफ हूँ. धर्म के नाम पर कुछ भी मूढ़ता चलती रहती हैं.
एक मित्र जो इन सब कामों में अक्सर लिप्त रहते हाँ, उनका तर्क था कि इन से कितने ही लोगों को रोज़गार मिलता है, उन का घर-परिवार चलता है. तो क्या बुराई है?
ऐसा ही कुछ तर्क दिया जाता है कि अयोध्या का पुनरः-उत्थान हो गया है. इकॉनमी को बूस्ट मिला है । क्या बुराई है?
यही तर्क सऊदी भी दे सकता है, लोग मक्का-मदीना जाते हैं, इस से वहां की इकॉनमी को फायदा मिलता है, क्या बुराई है?
बुराई है, बिलकुल बुराई है. जिस भी कार्य से इंसानी बुद्धि का हनन हो, वो कार्य इंसान की भलाई में हो ही नहीं सकता। अंततः उस से इंसान को नुक्सान ही होगा.
अँगरेज़ भारत में व्यापार करने आये थे. ईस्ट इंडिया कंपनी एक व्यापारिक कंपनी थी. वो लोग कलकत्ता उतरे थे लेकिन यहाँ के समाज को देख उन्हें समझ आया कि वो आसानी से कब्जा कर सकते हैं. और ऐसा ही हुआ. क्यों हुआ? धार्मिक किस्से-कहानियों में उलझा हुआ समाज, कोई वैज्ञानिक रुझान ही नहीं. यदि यह समाज वैज्ञानिक रूप से उन से बेहतर होता तो क्या यह सम्भव था? कभी भी नहीं.
क्या आज भी हमारा समाज वैज्ञानिक रुझान लिए है. बिलकुल भी नहीं. हमारे तो स्कूलों के नाम आज भी गुरु, बाबा, संतों के नामों पर हैं. मैंने नहीं देखा, किसी वैज्ञानिक, साहित्यकार के नाम पर कोई स्कूल ने नाम रखा हो अपना.
यहाँ इवेंट बाजी होती है, लेकिन क्या गली-गली कोई विज्ञान की गोष्ठियां करवाई जा रही हैं, क्या खेल मुकाबले करवाए जा रहे हैं, क्या स्वस्थ डिबेट करवाई जा रही हैं? यहाँ बस इवेंट-बाजी चल रही है. इवेंट-बाजी तथा-कथित धर्मों के नाम पर.
मेरा विरोध इवेंट-बाजी के ख़िलाफ़ नहीं है, मेरा विरोध फ़िज़ूल की इवेंट-बाजी के ख़िलाफ़ है.
किसी भी इवेंट को अटेंड करने वालों के लिए "टेक अवे/ Take Away" क्या है, यह माने रखता है. मतलब, उस इवेंट को अटेंड करने वाले क्या घर लेकर जाएंगे उस इवेंट से. नेट रिजल्ट यही है.
क्या वो कोई ऐसी सोच समझ, गाइडेंस, जागरूकता, विचार ले कर जाएंगे जिस से उन के जीवन में कोई रौशनी, कोई वैज्ञानिकता, कोई विवेक आएगा, यदि नहीं तो फिर सब फ़िज़ूल है, सब ड्रामे बाजी है, सब अंततः घातक है, हानिकारक है.
"बापू सेहत के लिए तू तो हानिकारक है."
तुषार कॉस्मिक


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