जंग के साये में इंसानियत: क्या धर्म और राष्ट्र की सीमाएँ हमारा भविष्य खा जाएँगी?
छोटी-मोटी मार-काट चलती ही रहती है लेकिन उस छोटी-मोटी मार-काट में हज़ारों लोग मर-कट जाते हैं. यह है हमारी दुनिया.
हम अपने भोजन के लिए मुर्गे, बकरे, मछली तो मारते-काटते ही हैं लेकिन अपनी खोखली समझ की वजह से एक दूजे को भी मारते काटते आ रहे हैं सदियों से.
यह है हम. इंसान। कुदरत का बेहतरीन शाहकार। खुदा का सर्वश्रेष्ठ नमूना।
ऊपर से हम एटम बम भी बना कर बैठे हैं. ऊपर से हमारे हुक्मरान। वल्लाह। माशाल्लाह।
इलाज क्या है?
पहले तो समझ लो यह दुनिया इसी तरह से बहुत देर तक चल नहीं पायेगी। हमारी अगली पीढ़ियाँ शायद ही इस धरती पर आ पाएँ। हद मार के एक या दो. क्यों? चूँकि वक्त के साथ-साथ मूढ़ता बढ़ती जा रही है. बर्बादी के साजो सामान बढ़ते चले जा रहे हैं.
इलाज क्या है?
सब धर्मों को विदा करो. नहीं चाहिए। इन की वर्ल्ड वाइड बहस करवाओ, लम्बी, कई कई दिन लम्बी। सख्त बहस. लाओ तर्क अपने-अपने। साबित करो. बकवास नहीं चलेगी। साबित करो, अन्यथा बकवास बंद करो.
पूरी दुनिया के लिए कुछ सांझे कानून बनाने होंगे। यह नहीं चलेगा कि हर मुल्क अपनी अलग ही दुनिया बना के बैठा है. नहीं। दुनिया एक है, टुकड़े काहे को कर के बैठे हो?
दुनिया एक है, यह भाव पैदा करना ही होगा। यह कौम, देश प्रदेश का भाव खत्म करना ही होगा।
पूरी दुनिया को एक मंच पर आना ही होगा। इस के बिना कोई भविष्य नहीं है. और यह मंच जँग का नहीं, बहस का होना चाहिए, समभाव का होना चाहिए और यह धर्मों की विदाई के बिना सम्भव नहीं है.
चोर चोरी करता है तो सब से ज़्यादा शोर वो ही मचाता है। वो ही चिल्लाता है: चोर, चोर. ताकि लोग समझें कि कम से कम वो चोर नहीं हो सकता। ये धर्म दिखाते हैं कि ये शांति चाहते हैं लेकिन ये ही सब से ज़्यादा अशांति का कारण हैं. लोगों अँधा बनाते हैं ये धर्म। धर्मांध।
Tushar Cosmic


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