नग्नता पुराण



पूरी कायनात नंगी है. तुम ढके रहते हो, छुपे रहते हो. लगभग हर वक्त छत्तों के नीचे रहते हो. कहते भी हैं, इंसान के सर पर छत ज़रूर होनी चाहिए। होनी चाहिए, कपड़ों में भी रहना चाहिए लेकिन हर वक्त? यह बीमारी है, यह बीमारी का एक बड़ा कारण है. तुम्हारे कपड़े, तुम्हारी छतें बीमारी का कारण हैं. कभी तो इन्हे छोड़ो भी. कभी तो नंगे होवो, कभी तो बिना छत के रहो.

गोरे  पग्गल हैं जो समद्र तटों पर नग्न पड़े रहते हैं. नहीं?

कुछ समाजों में औरत लगभग सर से पैर तक ढकी रहती है ता-उम्र. इसे क्या हवा मिलेगी, क्या खुली 
धूप मिलेगी?

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कुछ समाजों में औरत को बाल तक खोलने की इजाज़त नहीं है. ईरान में क्या हुआ? सैकंड़ों औरतें  मार दी गईं सिर्फ़ इसलिए कि उन्होंने अपने बाल ढकने से इंकार कर दिया। क्यों? चूँकि इंसानी चेहरे पर बाल आकर्षण पैदा करते हैं. आज भी यदि कोई गंजों के सर पर बाल उगाने का फार्मूला खोज  ले तो रातों रात धन-कुबेर बन जायेगा। 

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क्यों है ऐसा? चूँकि बाल अपने आप में धन है. हिंदी में कहा जाता है "केश राशि"। यानि अच्छे बाल भी एक धन है, पूँजी है, कैपिटल है, एक एसेट है. लेकिन क्यों? ऐसा कैसे? चूँकि अच्छे बाल अच्छे स्वास्थ्य की निशानी हैं. यौवन की निशानी हैं. ज़्यादातर बच्चों के बाल अच्छे ही होते हैं. जवानी तक अच्छे ही रहते हैं सो अच्छे बाल यौवन जी निशानी है.  

इस्लाम इस बात को समझता है. स्वस्थ सुंदर बाल आकर्षण पैदा करते हैं. इस ने स्त्रियों से यह छीन लिया। बाल बिलकुल नज़र नहीं आने चाहियें। 

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गुरूद्वारे में भी अब यही चलन है. बाल बिलकुल नज़र नहीं आने चाहिए।  सिख केश रखते हैं लेकिन ढक कर. गुरु का आदेश है. युद्ध काल का निर्णय था. कोई औचित्य रहा होगा। खैर. लेकिन गैर सिख को भी सर ढकना ही है गुरूद्वारे में.  शायद इसलिए कि स्त्री-पुरुष गुरूद्वारे में गुरु की वाणी पर ही ध्यान केंद्रित करें न कि  एक दूजे पर.  एक कारण यह हो सकता है. लेकिन ज़रूरी नहीं यही एक मात्र कारण हो या यही कारण हो. यह मेरी थ्योरी है. 

खैर, गुरुद्वारे में बाल ढकना, सर ढकना यह मुझे ठीक ठीक कभी समझ नहीं आया. कहते हैं कि ओशो जब स्वर्ण मंदिर आये तो उन्होंने द्वार पर ही बिना सर ढके अंदर आना चाहा लेकिन ऐसा शायद हो नहीं पाया चूँकि मैंने एक फोटो में देखा है कि वो गुरूद्वारे के अंदर खड़े हैं और उन का सर ढका हुआ है. 

मैंने किसी से यह तर्क भी सुना है कि जैसे हम बुज़ुर्ग या बड़े व्यक्ति के सम्मान में सर ढकते हैं वैसे ही गुरु के सम्मान में सर ढकते हैं. मुझे यह तर्क भी ख़ास जमता नहीं.  सवाल उठता है कि बड़े बुज़ुर्ग के सामने पड़ने पर भी सर क्यों ढकते हैं? सर ढका हो न ढका हो, किसी के मन में सम्मान है तो है, नहीं है तो नहीं है. सर ढकने से ही सम्मान प्रकट होता है ऐसा कोई ज़रूरी मुझे लगता नहीं और न ही मुझे लगता है कि नग्न सर वाला व्यक्ति अपने गुरु की, अपने बड़े की, अपने बुज़ुर्ग की, खुदा की कोई इंसल्ट कर रहा होता है.  

असली कारण शायद वही है जो मैंने बताया। स्वस्थ घने बाल यौन आकर्षण पैदा करते हैं. केश राशि। यह यौवन की निशानी है. यह सेक्स को प्रज्वलित कर सकती है. ज़रूरी नहीं, लेकिन कर सकती है. 

मुझे लगता है कि कपड़े की ईजाद ने इंसान के शरीर ही नहीं उस के ज़ेहन को भी बीमार किया है.  हर ईजाद दो-धारी तलवार होती है, आप उस का फायदा भी उठा सकते हैं आप उस से नुक्सान भी खा सकते हैं. वैसा ही कपड़े  के साथ हुआ है. 

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मेरे घर के साथ वाले पार्क में सुबह-सवेरे कोई छह-सात बजे मैं कपड़े निकाल के व्यायाम करता था. संघ की शाखा लगाने वालों का धर्म संकट में आ गया. अब मुझे डिस्ट्रिक्ट पार्क में एक अलग-थलग जगह पर जा कर व्यायाम करना होता है. क्यों? चूँकि मैं कपड़े उतारे रहता हूँ उतना समय. 

ओशो का नाम सुनते ही लोगों के मन में पहला चल-चित्र उभरता है कि उन के आश्रम में लोग नंगे घूमते हैं. जैसे नंगे घूमना कोई क़त्ल करना हुआ. 

कपडा उतरते ही सारी सभ्यता संस्कृति उतर जाती हो जैसे. शायद उतर ही जाती है. गिर ही जाती है. इसीलिए तो नग्नता स्वीकार ही नहीं.

महावीर नग्न हो गए. उन के साधू ड्रामा करते हैं नग्न होने का. नग्न होंगे भी, जननांग ढक भी लेंगे. जैसे-तैसे. 

कश्मीर में कहते हैं लल्ला नाम की औरत हुई. फ़कीर थी नग्न रहती थीं.

पश्चिम में कई न्यूड क्लब भी सुने जाते हैं.

ओशो के ऑरेगोन स्थित आश्रम में लोगों को नग्नता की भी स्वतन्त्रता थी, मैंने देखे हैं वीडियो। हर जगह नहीं होगी लेकिन निश्चित स्थान  पर यह स्वतन्त्रता रहती होगी। 

खैर, मेरा कुल जमा मतलब यही है कि इंसान को इतनी स्वतन्त्रता होनी चाहिए, ऐसे जगह होनी चाहियें जहाँ वो अंडर-गारमेंट्स में धूप ले सके, साँस ले सके, खेल सके, जी सके.

जी, साँस सिर्फ नाक-मुंह ही नहीं, पूरा शरीर लेता है.

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जब कभी धूप  नहीं होती और मैं खुले बदन में खड़ा होता हूँ तो मुझ से पूछा जाता है कि आज क्यों उतारे हैं कपड़े? धूप तो है ही नहीं? तो मेरा जवाब होता है कि हम सिर्फ धूप स्नान नहीं लेते, हम वायु स्नान भी लेते हैं. 

वैसे तो नंगे पैर भी रहना चाहिए। हर वक्त पैर भी ढके रहें यह भी कोई समझदारी नहीं। कभी तो धरती माता के डायरेक्ट सम्पर्क में रहिये। जूते यह सम्पर्क तोड़ देते हैं. आप के शरीर का धरती माता से डायरेक्ट सम्पर्क तोड़ देते हैं. हमें बताया जाता था कि नंगे पैर घास पर चलने से आँखों की रौशनी तेज  होती है। मेरा मानना यह है कि सिर्फ आंख ही नहीं पूरे शरीर को फायदा मिलेगा। कैसे? विज्ञान  खोजता रहेगा मेरी समझ बस इतनी है कि माँ की गोद में बच्चा जब खेलता है तो माँ और बच्चा दोनों खुश होते हैं. खुश होते हैं तो स्वस्थ होते हैं. 

अब आई बात छत्त के नीचे रहने की. 

छत्त के नीचे रहना, घरों में रहना यह तुम्हें गर्मी-सर्दी, जानवर, कीड़े-मकौड़ों से बचाता  है, यह हज़ार फायदे देता है
लेकिन
नुक्सान यह करता है कि तुम्हारा कुदरत से नाता तोड़ देता है. तुम्हारी ज़िंदगियों को कमरों में कैद कर देता है.

खुली हवा, खुली धूप , बारिश, सूरज, चाँद-तारे, आसमान क्या होते हैं तुम्हें भुला ही देता है. घास-मिटटी का अहसास खो जाता है तुम्हारा.

छत्त के नीचे रहते हुए तुम भूल जाते हो कि पेड़ की छाया भी कोई चीज़ होती है.

पंखे AC के नीचे तुम भूल जाते हो कि ठंडी कुदरती हवा भी कुछ होती है.

हीटर के नीचे तुम भूल जाते हो कि सर्दियों  की गुन-गुनी धूप भी कुछ होती है.

तुम भूल जाओ, भूल जाओ लेकिन तुम्हारा शरीर नहीं भूलता, वो तुम्हें बीमार करना शुरू कर देता है.

लेकिन तुम इतने इडियट हो कि फिर भी नहीं समझते और डॉक्टरों से दवा ले कर इस बीमारी को ठीक करने की कोशिश करते हो.

विटामिन डी कम आता है, गोलियां गटक लेते हो. बदन खुला छोड़ हवा-धूप  में बैठने की तुम्हारी समझ है ही नहीं. कुत्ता भी सर्दी में छाया छोड़ धूप में  बैठेगा लेकिन तुम्हें समझ कम ही आती है. 

फिर वही कहूंगा कि इंसान ने खुद को कपड़ों और छतों के नीचे ढक लिया है. अच्छी बात है. लेकिन अपनी अक्ल को भी ढक लिया यह बुरी बात है. 

नमन 

तुषार कॉस्मिक 

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