ताज़ा क़लाम




X-मुस्लिम ‘X-मुस्लिम’ क्यों कहलाते हैं खुद को?

आप को इस्लाम छोड़ के बाहर हुए लोग अपने नाम के आगे X-मुस्लिम लगाए दीखते हैं, किसी और रिलिजन के लोग ऐसा क्यों नहीं करते?

सीधा जवाब है, बाकी रिलीजन के लोगों को कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ता कि आप उनके रिलीजन के अंदर हो के बाहर।

इस्लाम एक गिरोह की तरह है.   जी. मैंने तो "गिरोह" शब्द प्रयोग करते देखा है मुस्लिमों को इस संदर्भ में. अगर ऐसा न होता तो आपको इस्लाम छोड़कर बाहर हुए लोग मुंह छिपाए नज़र न आते.

क्यों?

चूँकि उन्हें पता है, इस्लाम से बगावत मतलब मौत.

इसीलिए हमें X-मुस्लिम तो दिखते हैं X-हिन्दू, X-सिख या X-बौद्ध नहीं।

क्या हिन्दू मनुस्मृति से चलते हैं जैसे मुस्लिम क़ुरआन से?

अगर कोई हिन्दू या कोई भी गैर-मुस्लिम कह दे कि देश क़ुरआन से नहीं, संविधान से चलेगा — तो तुरंत जवाब आता है: “देश मनुस्मृति से भी नहीं चलेगा।”

अब इन महान बुद्धिजीवियों से कोई पूछे — पहली बात, कौन हिन्दू कह रहा है कि देश मनुस्मृति से चलना चाहिए?
और दूसरी बात, देश मनुस्मृति से चला कब था?

भारत में तो हमेशा अलग-अलग राजा हुए, अलग-अलग तरीके से राज हुआ। कोई एक किताब पकड़कर सबने शासन नहीं चलाया।
यहाँ मुग़ल आए, अंग्रेज आए, उनसे पहले हिन्दू राजा थे, Ashoka था जो बौद्ध था। किसने मनुस्मृति खोलकर शासन किया?

Ramayana या Mahabharata में कहीं लिखा है कि राज्य मनुस्मृति से चलाओ? कोई साफ निर्देश? कुछ भी नहीं। 

तो फिर यह डर किस बात का? यह बहस किस भूत से लड़ने के लिए खड़ी की जाती है?

भारत में सैकड़ों ग्रंथ रहे हैं — दर्शन, नीति, कथा, स्मृतियाँ, पुराण। Manusmriti भी उन्हीं में से एक ग्रंथ है। प्रभाव रहा होगा, मान लिया। लेकिन सिर्फ उसी से सब कुछ चलता था— अतिश्योक्ति है. 

क्या घर वापिसी के लिए जात-पात रुकावट है?

यदि कोई हिन्दू धर्म में आना चाहे तो सबसे पहला सवाल उछाला जाता है — किस जाति में जाओगे? ऊँची जाति वाले अपनाएँगे क्या?

सच यह है — यह सब दिमागी धुआँ है। डर फैलाने वाला प्रोपेगेंडा।

मेरा जन्म सिख परिवार में हुआ, पालन-पोषण हिन्दू माहौल में हुआ। पत्नी हिन्दू है। भाभी ईसाई थीं। भाई सिख हैं। और मैं खुद न हिन्दू कहलाना ज़रूरी समझता हूँ, न सिख।

लेकिन कभी किसी ने मुझे अलग किया? बहिष्कृत किया? दूरी बनाई? — नहीं। बिल्कुल नहीं।

तो अगर कोई मुसलमान या ईसाई अपना पुराना धर्म छोड़कर मंदिर आ जाए, गुरुद्वारे आ जाए — कौन रोकेगा? कोई नहीं।
असलियत यह है कि मंदिरों और गुरुद्वारों में कोई यह पूछता ही नहीं कि तुम किस धर्म के हो।

तुम खुद को हिन्दू कहना चाहते हो? कहो।
जाति नहीं मानते? मत मानो।
नाम लिख दो — बस।

न कोई फॉर्म भरवाएगा, न कोई जाति-प्रमाण पत्र माँगेगा, न कोई सूली पर चढ़ाएगा।

उम्मीद है उन लोगों को जवाब मिल गया होगा जो बहुत अकड़ के साथ पूछते हैं — “हिन्दू धर्म में जाओगे तो किस जाति में जाओगे?”

जवाब: यहाँ कोई पहरेदार बैठा नहीं है। 

ईरान-अमरीका-इस्राइल टकराव: क्यों और कैसे?

ईरान-अमरीका युद्ध की खबर आते ही भारत में रसोई गैस को लेकर हाय-तौबा शुरू हो गई। जैसे कल सुबह से चूल्हे ठंडे पड़ जाएँगे। मुझे तो अभी इतनी भयानक स्थिति दिखती नहीं।

मान लो गैस कम हो गई — तो क्या दुनिया खत्म?
इंडक्शन है।
वो नहीं तो लकड़ी है।
वो भी नहीं तो कुछ दिन कच्चा खा लो — टमाटर, खीरा, फल।
एक टाइम खाओ, कम खाओ।

युद्ध है भाई, पिकनिक नहीं। युद्ध नहीं होने चाहिए — बिल्कुल नहीं — लेकिन इतिहास उठाकर देख लो, कई बार युद्ध के बिना शांति भी नहीं आई।
राम-रावण युद्ध था।
कृष्ण ने Arjuna को युद्ध से भागने नहीं, लड़ने की ही शिक्षा दी थी।

ईरान में भी जनता पर उनकी अपनी सरकार ही कहर ढा रही थी। जबरन धार्मिक शासन, विरोध करने वालों पर गोलियाँ, हजारों लोग मारे गए। मैं तो कहता हूँ — एक भी निर्दोष नहीं मरना चाहिए। जो सरकार अपनी ही जनता को कुचल दे, उसे हटना ही चाहिए।

अमरीका और इज़राइल वही कर रहे हैं — और यह रुकने वाला नहीं।

आज का युद्ध भीड़ का नहीं, टेक्नोलॉजी का है। संख्या बल की अहमियत पहले भी सीमित थी, अब तो और कम हो गई है। AI का दौर है — मशीनें लड़ती हैं, इंसान नहीं। ऐसे में आबादी का घमंड किस काम का?

भारत में भी लोग बड़ी-बड़ी डींगें हाँकते हैं — हम ये हैं, हम वो हैं — लेकिन वही जोश-जज़्बा कहाँ था जब सदियों तक अंग्रेजों के अधीन रहे? तब सब हवा निकल गई थी।
साफ बात: भावनाएँ नहीं, टेक्नोलॉजी जीतती है।

इसलिए अंत क्या होगा, अनुमान लगाना मुश्किल नहीं। ताकतवर, तकनीकी रूप से आगे देश ही जीतेंगे।

और मेरी व्यक्तिगत राय — जहाँ भी सरकारें धर्म या ताकत के नाम पर अपनी जनता को गुलाम बनाकर रखें, वहाँ बाहरी दखल कभी-कभी जरूरी हो जाता है। “राष्ट्रीय संप्रभुता” की भी एक सीमा होती है। अपनी जनता को कुचलने की छूट नहीं हो सकती।

तो हाँ, थोड़ी महँगाई, थोड़ी किल्लत, थोड़ी असुविधा — झेल लो।

हलाला और नियोग: तुलना जायज़ है या भ्रम?

मुसलमान को अगर हलाला का विरोध करना होता है, तो वो अपने समाज में, अपने ग्रंथों में झाँकने के बजाय हिन्दू को घसीट लाता है — और तुरंत “नियोग” का हवाला दे देता है।

अब नियोग क्या है? महाभारत में कहीं-कहीं ऐसा वर्णन मिलता है कि संतान पैदा करने के लिए पति के अलावा किसी दूसरे पुरुष से सम्बन्ध बनाया गया। ठीक है, मान लिया — ग्रंथ में लिखा है।

लेकिन आज कौन कर रहा है नियोग? हिन्दू समाज में एक भी आदमी? कोई नहीं। यह तक पक्का नहीं कि यह कभी सामाजिक प्रथा थी भी या सिर्फ कथा का हिस्सा।

और महाभारत-रामायण कोई ऐसे प्रामाणिक इतिहास या कानून की किताबें नहीं हैं, जिन्हें हिन्दू लोग कुरआन की तरह शब्द-शब्द अंतिम सच मानते हों।

रामायण तो खुद कई लोगों ने लिखी है। Ramcharitmanas अलग, Valmiki Ramayana अलग — दोनों में ढेर फर्क। हिन्दू समाज को इससे कोई खास फर्क पड़ता भी नहीं।

यहाँ तक कि “हिन्दू” शब्द बाहर से आया या यहीं का है — इस पर भी किसी की नींद हराम नहीं होती। हिन्दू समाज इस तरह की बातों पर पहचान का संकट नहीं पालता।

कज़िन मैरिज बनाम ब्रह्म-सरस्वती कथा: क्या तुलना सही है?

यदि कोई गैर-मुस्लिम मुसलमानों में कज़िन मैरिज पर सवाल उठा दे — या रिश्तेदारी के भीतर शादी पर उँगली रख दे — तो जवाब तुरंत तैयार मिलता है: ब्रह्मा-सरस्वती।

कि देखो, तुम्हारे यहाँ भी Brahma ने Saraswati से सम्बन्ध बनाया, और वह उनकी बेटी थी।

मान लो, किसी कथा में ऐसा वर्णन है। तो क्या?

भाई, पहले यह तो समझो — हिन्दू समाज कोई “एक किताब से चलने वाला सिस्टम” नहीं है। यहाँ कोई सिंगल रूल-बुक नहीं, जिसे सब मानें वरना बाहर कर दिए जाओ।

यहाँ हजारों ग्रंथ हैं, पुराण हैं, लोककथाएँ हैं, दार्शनिक किताबें हैं, संप्रदाय हैं.
बहुत-सी बातें सिर्फ कथा हैं और बहुत-सी बस सुनी-सुनाई मिथक — कोई सामाजिक कानून नहीं।

कोई हिन्दू आज यह नहीं कहता कि “ब्रह्मा ने किया था, इसलिए हम भी करेंगे।”
जमीन पर हिन्दू समाज ऐसे नहीं चलता।

इसलिए हर बहस में यह उदाहरण घसीटना ऐसा है जैसे किसी फिल्म की कहानी उठाकर असली दुनिया का कानून साबित करना।

अगर किसी प्रथा पर सवाल उठता है, तो जवाब अपने समाज के भीतर से दो — न कि दूसरे धर्म की कथाएँ उठाकर ढाल बना लो।

सीधी बात:
दूसरे के मिथक से अपने रिवाज़ सही नहीं हो जाते।

पहले अपने घर में देखो, फिर पड़ोसी की छत पर चढ़ो। 

"फिर मुस्लिम तो इस्लाम के अलावा किसी अन्य रिलिजन को मानते ही नहीं कि वो रिलिजन, मज़हब, दीन है. जित्ता मुझे पता है, उन के मुताबिक सिर्फ वो हक़ पर हैं बाकी सब मान्यताएं बातिल हैं. तो फ़िर खुद की मान्यताओं का जवाब देने की बजाये दूजे की मान्यताओं के पीछे काहे जा छुपते- छुपाते हैं?"

साबित सूरत, सुन्नत, प्राकृतिक जीवन: तर्क कितना टिकता है?

सिक्ख कहते हैं कि वो "साबित सूरत" हैं. मतलब गॉड ने जैसी सूरत दी वैसे. मतलब गॉड ने, भगवान ने, वाहेगुरु ने उन को शरीर पर बाल दिए तो वो खुद को वैसे ही रखते हैं केशों को काटना केश क़त्ल करना समझते हैं.

यदि  तर्क यह है कि खुद को कुदरती तौर पर रखना है तो फिर हमारी जीवन में तो कुछ भी कुदरती नहीं है. हम कपड़े क्यों पहनते हैं? खाना आग पर क्यों पकाते हैं? गर्मी में AC क्यों चलाते हैं और सर्दी में रजाई क्यों ओढ़ते हैं? नंगे क्यों नहीं रहते? गर्मी में सर्दी क्यों बना के रखते हैं AC  से और सर्दी में गर्मी क्यों बनाते हैं हीटर द्वारा? और जब इतना कुछ करते हैं तो बाल काटने से क्या फर्क पड़ने वाला है? 

वैसे जितना मुझे पता है यह दशम गुरु गोविन्द सिंह जी का आदेश था, केश रखने का. लेकिन यहाँ मेरा विरोध उस आदेश को ले कर नहीं है, साबित सूरत वाले तर्क को लेकर है. 

 वैसे  रिलिजन मान्यत्ताओं का ही समूह होता है. तर्क बिठाने लगो तो नाराज़गियाँ शुरू हो जाती हैं, क़त्ल तक हो जाते हैं.

ऐसे ही मुस्लिम को अल्लाह पे पूरा यकीन है. गुड. तो फिर अल्लाह के बनाये तन में आदमी लोगों की काँट -छाँट क्यों की जाती है. सुन्नत क्यों? यदि ज़रूरी होती तो अल्लाह कर के भेजता न. By Default. उस ने तुम्हारा शरीर, इतनी ज़हीन मशीन बनाई तो वो सुन्नत भी कर के भेज सकता था. नहीं? पूरा यकीन रखो न अल्लाह पर. लेकिन नहीं?

कथनी और करनी एक होनी चाहिए: क्या सच में? 

लोग कहते हैं — इंसान की कथनी और करनी में फर्क नहीं होना चाहिए।
मैं कहता हूँ — थोड़ा फर्क न हो तो इंसान इंसान नहीं, टाइम बम बन जाएगा।

सोचना कुछ, कहना कुछ, करना कुछ — यह पाखंड नहीं, सर्वाइवल स्किल है।
हर सच हर जगह नहीं बोला जाता — और न ही बोलना चाहिए।

अगर हम सब एक-दूसरे का दिमाग पढ़ पाते, तो दुनिया में एक भी रिश्ता जिंदा न बचता।
इतना कूड़ा, इतना गुस्सा, इतनी बेकार कल्पनाएँ घूमती रहती हैं भीतर — ऊपर से सभ्यता का पेंट चढ़ा है बस।

सच यह है — समाज सच से नहीं, कंट्रोल्ड सच से चलता है।

हाँ, हर समय दोमुंहा रहना भी बीमारी है।
और हर समय कड़वा सच उगलना भी।

सीधी बात:
न पूरा फ़र्क सही,
न पूरा एक जैसा होना सही।

समझदार वही है जिसे पता हो —
कब चुप रहना है,
कब बोलना है,
और कब बिल्कुल उल्टा करना है।

बाकी “मैं तो मुँह पर सच बोलता हूँ” वाले लोग ज़्यादातर रिश्ते खो देते हैं… और फिर दुनिया को दोष देते हैं। 

~ Tushar Cosmic

Comments

  1. Copyvkarkevfb पर टांग दूं क्या

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