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भारत का चुनावी ढांचा: SIR विवाद, EVM बनाम बैलेट पेपर और बायोमेट्रिक-आधारित पारदर्शी समाधान

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## 1. मुख्य बिंदु और पृष्ठभूमि (Executive Summary) * **SIR की पृष्ठभूमि:** भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल के दौरान चुनाव आयोग द्वारा 'विशेष सघन पुनरीक्षण' (Special Intensive Revision - SIR) अभियान चलाया गया। * **विवाद की वजह:** इस अभियान के तहत मतदाता सूचियों के गहन सत्यापन के लिए नागरिकों से वर्ष 2002-2004 तक के पुराने दस्तावेज़ मांगे गए और बड़े पैमाने पर नोटिस जारी किए गए। * **जनता की समस्या:** बाढ़, दंगे, पलायन, अनपढ़ता और पुराने वोटर कार्डों में मौजूद स्पेलिंग/उम्र की गलतियों के कारण 20-25 साल पुराने रिकॉर्ड देना आम नागरिकों के लिए अत्यंत कठिन और डरावना साबित हो रहा है। * **मूल प्रश्न:** जब देश में आधुनिक डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, बायोमेट्रिक्स और सर्वव्यापी पहचान डेटाबेस मौजूद हैं, तो कागजी सत्यापन और पुराने रिकॉर्ड्स के झंझट की क्या वास्तव में आवश्यकता है? --- ## 2. वर्तमान SIR प्रणाली की व्यावहारिक समस्याएँ ### क) पुराने दस्तावेज़ों और रिकॉर्ड्स का संकट * **22-25 साल का अंतराल:** 2002 के रिकॉर्ड खंगालना व्यावहारिक नहीं है। बाढ़, आग, प्राकृतिक आप...

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 "मेरे बाल"

मेरे बालों से बहुत लोगों को बहुत शिकायत रहती है.
और यह शिकायत तब और ज्यादा उभर के सामने आती है जब मेरा लेखन या मेरा कथन किसी को बिल्कुल पसंद नहीं आता. और उनकी जमी-जमाई मान्यताओं के बिल्कुल उलट खड़ा होता है। शीर्षासन कर रहा होता है.
तो ऐसे में भद्र-जनों को और कुछ नहीं मिलता तो वह सीधा मेरे बालों पर अटैक करते हैं कि यह बाल मेरे सिर पर क्यों है.
तो सवाल यह है कि सिर मेरा है, बाल मेरे हैं, मेरे सिर पर है, मुझे कोई दिक्कत नहीं है, दूसरों को दिक्कत क्यों होती है?
कहीं ऐसा तो नहीं कि वह गंजे हैं.

सोच कर बताइएगा आप सब लोग, कमेंट कीजिएगा. ~~~~~~~~~~~~~~~ मै वन्दे मातरम गा नहीं सकता, ना भाई, एक अंतरा भी नहीं। जन गण मन भी भूल चुका हूँ, बस कुछ टूटे-फुटे टुकड़े याद हैं। स्कूल के दिनों में गा लेता था जैसे बाकी सब गाते थे।

तो क्या हुआ?
कसम से, ये भारतीय नेता भी ना, एकदम ओवरस्मार्ट बेवकूफ हैं। फालतू की बातों का बतंगड़ बनाते हैं। देश का ध्यान असली मुद्दों से भटकाने के लिए। इन गानों या anthems को लेकर एक-दूसरे पर इल्जाम लगाते रहते हैं।
भला कोई ये कैसे तय कर सकता है कि मैं इस समाज का कम भला चाहने वाला हूँ, और जो इन गानों को गा ले वो मुझसे बेहतर है?
मुझे तो नेशनल सॉन्ग या एंथम के इस कॉन्सेप्ट का कोई मतलब ही समझ नहीं आता। सरकार के एकदम फालतू के चोचले हैं।
मैं वीडियो बनाता हूँ, आर्टिकल लिखता हूँ, इसमें टाइम, एनर्जी और पैसा सब लगता है। क्यों? क्योंकि मैं इस समाज को बेहतर बनाना चाहता हूँ। पर मेरा इन गानों को रटने और गाने में कोई यकीन नहीं है। बिल्कुल नहीं। और मुझे नहीं लगता कि इससे मैं कोई कम अच्छा इंसान बन जाता हूँ।
पर भाई, ये जितने भी नारे, गाने और एंथम होते हैं, ये सब अपने आप, नेचुरली निकलते हैं। किसी खास वक्त और हालात की उपज होते हैं, उस टाइम की जरूरत होते हैं, एकदम ऑर्गेनिक तरीके से बनते हैं। और फिर इन्हें जबरदस्ती थोपना, रटना और गाना कंपलसरी करना—ये सब एकदम बेवकूफी है।
~~~~~~~~~~~~~~~
कोई बात तन से भी होती है, पर जो होती है वो मन की ही होती है। मन का मतलब ही है, चलती हुई बातें, शब्द... और मन है क्या? मोदी ने बेवकूफों की तरह अपने मोनोलॉग का नाम 'मन की बात' रख दिया। असल में तो ये 'मन की बकवास' है। ~~~~~~~~~~~~~~~

साहब, Big Boss,  वो भाषण बाज हैं मजमे बाज हैं बतौले बाज हैं एक्टिंग बाज हैं जुमले बाज हैं, नौटंकीबाज,ड्रामाबाज है।

उनका ध्यान पैकिंग पर ज्यादा है। मटेरियल की क्वालिटी पर कम है।
उनका ध्यान मार्केटिंग पर ज्यादा है। प्रोडक्ट पर कम है।

उनका ध्यान सजे सवरे रहने में ज्यादा है। काम करने में कम है।

बताएं मैं कौन से साहब की बात कर रहा हूं। बताने वाले को मिलेगा 101 रुपये देने पर  धन्यवाद।
~~~~~~~~~~~~~~~ यह जो लोग कहते हैं कि कोई एक नाम बताएं जो मोदी का विकल्प हो। यानी भारत में कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो अगर मोदी प्रधानमंत्री ना बने तो प्रधानमंत्री बन सके।

असल में ऐसा कह के यह लोग 150 करोड़ भारतीयों का अपमान कर रहे होते हैं। मतलब इनको यह लगता है कि 150 करोड़ भारतीयों में एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो प्रधानमंत्री बन सकता हो, मोदी की जगह ले सकता हो। सब मंदबुद्धि हैं, जाहिल हैं। किसी में कोई कमिटमेंट नहीं है, कोई समझ नहीं है, कोई राजनीतिक चैतन्य नहीं है। यह सरासर एक बकवास बात है।

असल में यह लोग यह कह रहे होते हैं, इस तरह के लोग कि उनको प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के लिए मोदी जितनी ब्रांड वैल्यू वाला व्यक्ति कोई नजर नहीं आता।

यहां मतलब ब्रांड वैल्यू से है और यह बात सही भी है। लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि राजनीति ब्रांड वैल्यू पर आधारित है। राजनीति वैल्यू पर आधारित होनी चाहिए ना कि ब्रांड वैल्यू पर, ना कि ब्रांडिंग पर।

जिस दिन ऐसा होगा उस दिन हमें मोदी का एक नहीं अनेक विकल्प मिल जाएंगे।

वह विकल्प अभी भी मौजूद हैं। बस उनकी ब्रांडिंग नहीं है। वह विकल्प मैं हूं, आप हैं, हम सब हैं।

मोदी की असलियत तो यह है कि एक प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं झेल पाए वह, कर ही नहीं पाए 12 सालों में पिछले और वह एक झूठी ब्रांडिंग करके उनकी एक इमेज खड़ी करी है। बस यह है मोदी।

बाकी तो मोदी क्या, मोदी से हजार गुना व्यक्ति हमें भारत में एक नहीं अनेक मिल जाएंगे।
~~~~~~~~~~~~~~~ वह तिरंगा यात्राएं करेंगे। घर-घर तिरंगा लगाएंगे।
अच्छी बात है।
फिर भी तुम अड़े रहना। डिमांड करना। बेहतर अस्पतालों की, बेहतर स्कूलों की, बेहतर पुलिस की, बेहतर न्यायालयों की, अड़े रहना।
फोकस इधर-उधर मत करना।
~~~~~~~~~~~~~~~ गाली को ही मुद्दा बना दिया गया है। जैसे गाली हमारे समाज में पहली बार किसी ने किसी को दी हो।

बस प्रधानमंत्री मोदी जी से बर्दाश्त नहीं हुआ कि वह तो महामानव है, वह तो नॉन बायोलॉजिकल है। घर-घर मोदी, हर-हर मोदी लेकिन यह गालियां कैसे पड़ गई?

यह बर्दाश्त नहीं हुआ मोदी साहब से।

गाली हमारे समाज का एक हिस्सा है। It should not be, but it is. उसमें Gen Z ने दी या X--Z किसी ने भी दी। यह कोई नई बात नहीं है। हर गली मोहल्ले गाली दी जाती है।

फूलन पर बनी हुई फिल्म याद है? मां बहन की गालियों से भरी हुई थी। Dhurandhar फिल्म में भी खूब गालियां हैं। ओटीटी पर जो प्रोग्राम आते हैं उनमें खूब गालियां होती हैं।

और सोशल मीडिया पर लोग एक दूसरे को जम के गाली दे रहे होते हैं नंगी। और मुझे नहीं पता आईटी सेल है या नहीं है लेकिन ग्रुप्स जरूर हैं। आप इस्लाम के खिलाफ बोलो, आपको भर-भर गालियां आएंगी, धमकियां आएंगी। हिंदुत्व के खिलाफ बोलो, हिंदुओं के खिलाफ बोलो तो आएंगी।

सब एक दूसरे को गाली देने में लगे हुए हैं।

तो गाली कोई नई चीज है क्या? कि जी जैन जी ने क्यों दे दी गाली?

यह कोई मुद्दा है ही नहीं। मुद्दा बस इतना ही है कि गाली मोदी को क्यों दे दी है? महामानव मोदी जी को क्यों दे दी? बस यही एक मुद्दा है और कोई बात ही नहीं है जिसको लेकर बाकी सारे मुद्दे जो जंतर-मंतर पर उठाए गए उनको ओझल किया जा रहा है। Dim किया जा रहा है। 

एक ही मुद्दा था अभी तो। और वह था पेपर लीक का।

भारत में दुनिया भर- जहां के मुद्दे ही मुद्दे हैं।
हर शहर गंदा है।
कूड़ा तक उठाया नहीं जा रहा।

स्कूल~ स्कूल फेल हैं, सरकारी स्कूल।

अस्पताल~ सरकारी अस्पताल फेल हैं।

पुलिस~ आम आदमी से पूछ के देखो पुलिस की छवि क्या है? पता लग जाएगा।


कोर्ट~ एक कहावत है कि कोर्ट और अस्पताल और पुलिस की सीढ़ियां दुश्मन भी ना चढ़े।

इतना खराब है यह सिस्टम कि दुश्मन के लिए भी दुआ की जाती है कि वह भी ना चढ़े। वह भी इनकी सीढ़ियां ना चढ़े।

आई बात समझ में? तो यह तो हाल है। यह हर डिपार्टमेंट का हाल है। इंडिया बदला नहीं है। यह कहावत जबकि पुरानी है। ~~~~~~~~~~~~~~~ राजनीतिक सत्ता का एक जगह जमा होना आम लोगों के लिए बहुत बुरा है। आम लोग सरकार के गुलाम बन जाएंगे। यह मंज़ूर नहीं है। मैं निकट भविष्य में कभी भी BJP को वोट नहीं दूंगा। नहीं। वह पहले से ही बहुत ज़्यादा ताकतवर हो चुकी है। मैं पूरी कोशिश करूंगा कि उसकी ताकत कम हो।
~~~~~~~~~~~~~~~ मेरा कोई फिक्स दीन धर्म राजनीतिक या सामाजिक विचारधारा नहीं है। कोई भी ऐसी विचारधारा मेरी नहीं है जिसे आप किसी खास सांचे या खांचे में फिट कर सके। मैं कभी भी किसी के भी पक्ष में या किसी के भी विरोध में कुछ भी बोल सकता हूं, लिख सकता हूं, कह सकता हूं।

मैं स्वतंत्र हूं।
आज आप मेरी किसी बात से सहमत हो सकते हैं। कल मैं आपको दुश्मन नजर आ सकता हूं।

आज मैं आपको दुनिया का सबसे बेहतरीन व्यक्ति दिख सकता हूं

और कल सबसे निकृष्ट घटिया।
यह मैं हूं।
मैं बर्फ नहीं हूं। मैं पानी हूं बहता हुआ। आप मुझे अपनी मुट्ठियों में बंद नहीं कर पाएंगे।

मैं तुषार हूं। तुषार कास्मिक। तुषार कास्मिक नमस्कार। ~~~~~~~~~~~~~~~ *घटिया ढंग of Our Govt*

हमारी सरकारें किस कदर *घटिया ढंग* से काम करती हैं, इसके कुछ उदाहरण नीचे दिए गए हैं:
1. आईजीएल सरकार के अंडर काम करती है और किचन गैस की पाइपलाइनिंग करती है।
2. उस पाइपलाइनिंग के लिए, बढ़िया सड़कें भी चाहे बनी हों इन्हें खोदना होता है और खोदकर जगह-जगह गड्ढे कर दिए जाते हैं।
3. इन गड्ढों को यह फिर रिस्टोर करते हैं, लेकिन पूरी सड़क को रिस्टोर नहीं करते हैं, सिर्फ उन गड्ढों को ही रिस्टोर करते हैं।
4. *कोई आपसे आपका बढ़िया कोट उधार मांगे और बोले कि आपको वापस मिल जाएगा लेकिन इसमें एक पैबंद लगाकर दिया जाएगा, तो क्या आप कभी अपना कोट उधार देंगे?*
लेकिन जनता को अपनी सड़कें आईजीएल को इसी शर्त पर देनी पड़ती हैं कि आईजीएल उनकी सड़कें तोड़ेगा और फिर पैबंद लगाकर वापस कर देगा।
यह है पहली घटिया नीति हमारी सरकारों की।
5. दूसरा जो घटिया ढंग है हमारी सरकारों का काम करने का, वह यह है कि आईजीएल जब गड्ढे खोदता है तो उसमें से मिट्टी निकालता है। वह मिट्टी पूरी तरह कभी भी वापस उन गड्ढों में जाती नहीं है।
6. वह मिट्टी जाती है लेकिन आईजीएल के करने से नहीं जाती है, और उसी का नतीजा यह होता है कि वह गड्ढे खोखले रह जाते हैं और ऊपर से उनको कवर कर भी दिया जाता है लेकिन कुछ समय बाद वह दब जाते हैं।
7. यह जो मलबा उठाने की बात होती है न आईजीएल के काम के बाद, असल में होना तो यह चाहिए कि एक भी चम्मच मलबा वापस जाने ही नहीं देना चाहिए, बल्कि वह आईजीएल को नाक पकड़कर, रगड़कर बोलना चाहिए कि वापस डालो। जहाँ से निकाला वहीं वापस डालो। ~~~~~~~~~~~~~~~
अब RSS/BJP लॉबी जंतर-मंतर पर मौजूद युवाओं पर मोदी के ख़िलाफ़ अभद्र भाषा इस्तेमाल करने का आरोप लगा रही है, मानो जंतर-मंतर से पहले कोई गाली-गलौज करता ही नहीं था। 'मोहल्ला अस्सी', 'फूलन', OTT, 'धुरंधर'... इन सबमें गालियों की भरमार है। हर जगह लोग गाली-गलौज कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर लोग बकवास करते हैं और विरोधियों को गालियां देते हैं। लेकिन जंतर-मंतर वाले युवाओं ने गाली दी। हां... उन्होंने गाली दी। लेकिन उन्हें पीटने और आत्महत्या करने के लिए मजबूर करने के बाद आप उनसे क्या उम्मीद करते हैं? ~~~~~~~~~~~~~~~
सरकार ज़रूर तुम्हारी है, पर देश हमारा है!
World हम सबका है !
और सरकार के खिलाफ बोलना, देश के खिलाफ बोलना नहीं होता है, देशद्रोह नहीं होता है। ~~~~~~~~~~~~~~~ घर-घर मोदी से ..नॉन-बायोलॉजिकल मोदी.............भगवान मोदी ...से.....घर्र-घर्र..मोदी तक! ~~~~~~~~~~~~~~~ Modi...He is a God himself... Non-biological entity....people have started worshipping him literally..... his temple is being built...see, what this BJP Govt. has given to this Nation...a New God. ~~~~~~~~~~~~~~~ India needs chaos. And only from that chaos a better, re-arranged society can emerge. A culture in which more than 50% of the people are not living but just existing somehow, is no culture. It is a system made by the vultures, for vultures. It is no culture. ~~~~~~~~~~~~~~~
The Cockroaches are great. They did at Jantar-Mantar that never happended post Independence. Example has been set. Now Indians be persuaded and use all the Metro cities Protest points, make peaceful protests, legally, logically.
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समझदार पुलिसवाला खुद सीधा रिश्वत नहीं ले कर पनवाड़ी की दुकान प्रयोग करता है...क्या हमारे साहेब, बड़े साहब भी तो वैसा ही नहीं कर रहे....सीधा कुछ नहीं ले रहे...लेकिन अपने इर्द-गिर्द पूंजी-पति जी जो जमात है उन की जेब भरवाए जा रहे हैं. अपनी जेब क्यों गंदी करनी? उनकी जेब भी तो अपनी ही जेब है. अपनी जेब पाक-साफ़.
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"वसुधैव कुटुंबकम" Versus "विश्व बंधुत्व"
* "वसुधैव कुटुंबकम" से भी जो बढ़िया धारणा है, वह है "विश्व बंधुत्व" की।
* वसुधैव कुटुंबकम में वसुधा यानी पृथ्वी को एक कुटुंब की तरह मानते हैं, लेकिन विश्व बंधुत्व में हम पूरा विश्व को अपना बंधु मानते हैं, विश्व के तमाम चर-अचर, नश्वर-अनश्वर तत्वों को अपना बंधु मानते हैं, अपना मानते हैं।
* विश्व बंधुत्व का जो धारणा है, वह ज्यादा प्रसार लिए हुए है, उससे ज्यादा प्रसार हो ही नहीं सकता।
* तो मुझे ऐसा लगता है कि विश्व बंधुत्व से, इस संदर्भ में, कोई भी और बढ़िया धारणा हो नहीं सकती है।
That is Why "Cosmic hain Hum".
Tushar Cosmic
~~~~~~~~~~~~~~~ Apart from Cockroaches,
I like Prahant Kishore,
And then Raj Thakre,
And then somewhat Shashi Tharoor
AND THEN THE MOST I LIKE MYSELF.
~~~~~~~~~~~~~~~ जैसे भारत में अनपढ़ों को बना रखा है प्रधानमंत्री ~ शिक्षा मंत्री, ऐसे ही गडकरी जिन से चला भी नहीं जाता, उन्हें बना रखा है ट्रांसपोर्ट मिनिस्टर~ यातायात मंत्री.
पीछे जब योगा डे था ना योग दिवस ~ उस दिन यह गडकरी साहब योगासन कर रहे थे.
जानते हैं कैसे? कुर्सी पर बैठ के. इनसे खड़ा भी नहीं हुआ गया.
और यह है हमारे गन्ना ~सॉरी~ ट्रांसपोर्ट मिनिस्टर. Tushar Cosmic

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