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किसी भी राजनेता के विपक्ष में लिखने से कुछ नहीं होगा, चाहे मोदी हो, चाहे राहुल गांधी, चाहे केजरीवाल. हम फेसबुक टीपते रह सकते हैं लेकिन खेल इन्ही के हाथ में रहेगा. एक जाएगा, दूसरा आएगा. या तो विकल्प बनाओ या बनो. खुद बनते हो तो बढ़िया, वरना बनाओ. मैं तैयार हूँ बनने को. स्टार्ट-up फिनान्सर ढूंढिए. करोड़ों लगेंगे. दिल्ली से शुरू करते हैं. अपने हाथ से खर्च करें. कुछ और हो न हो, मुल्क का निश्चित ही भला होगा, यह गारंटी है.
गली में कालीन या दरी बिछते ही बच्चे भागना -दौड़ना-खेलना शुरू कर देते हैं. धमा-चौकड़ी शुरू. आप पार्क में बैठ कर लौटते हैं तो थोड़े और जीवंत हो उठते हैं. जीवन जीने के लिए स्पेस की ज़रूरत है पियारियो. बंदे पर बन्दा न चढाओ. शायर साहेब लगे हैं, माइक कस कर पकड़े हैं. कईओं को तो माइक खूबसूरत महबूबा से भी ज़्यादा अज़ीज़ होता है, मिल जाए बस, छोड़ना नहीं फिर. तो शायर साहेब लगे हैं. "कुत्ते की दम पर कुत्ता. कुत्ते की दम पे कुत्ता. फिर उस कुत्ते की दम पे कुत्ता. बोलो वाह!" जनता चिल्ल-चिल्लाए,"वाह! वाह, वाह!!" वो आगे फरमाते हैं, "उस कुत्ते की दम पे एक और कुत्ता., अब उस कुत्ते की दम पे एक और कुत्ता..." भीड़ में से किसी के बस से बाहर हो गया, वो चिल्लाया, पिल-पिल्लाया," बस करो भाए, बस करो. दया करो, ये सब गिर जाएंगे." हम से कब कोई चिल्लाएगा? "बस करो भाई, ये गिर जायेंगे."
है वो वकील लेकिन  वित्त मंत्री बना दिया जाता है. अगली बार आप अपना कोर्ट केस चार्टर्ड-अकाउंटेंट को लड़ने को देना और अपनी इनकम टैक्स रिटर्न किसी आम वकील को भरने को देना. करेंगे आप ऐसा ?  महान है यह मुल्क. यहाँ तो  एक्टिंग करने वालों ,  क्रिकेट खेलने वालों , गाना गाने वालों , चाय वालों  तक को कानून बनाने के लिए बिठाल दिया जाता है. शर्म भी नहीं आती इन लोगों को. कई तो मुश्किल ही शक्ल दिखाते हैं सदन में , फिर भी पदों पर बरसों जमे रहते हैं. शर्म भी नहीं आती इन लोगों को. रिकॉर्ड मतों से  से हारा , जनता का दुत्कारा वकील  सरकार में मंत्री बन जाता है.  जनता ने जिसको इस काबिल नहीं समझा कि उसे कोई ज़िम्मेदारी दी जाए , वो  पिछले दरवाज़े से जनता के सर पर बैठ  जाता है. कमाल है भाई!
Believing in unsystematic Belief systems is not Bullshit, but Human-shit, Holy-shit.
I see dog in God and God in dog. I am neither theist nor atheist. I am a thesis-ist.
1 जनवरी, 2017. नया साल मनाते हुए लोग. तुर्की. इस्ताम्बुल. Night क्लब. अल्लाह-अकबर के नारे के साथ अँधा-धुंध गोलियां बरसाता हुआ शख्स, तकरीबन 40 लोग मरे. कई ज़ख्मी. कितने मुस्लिम ने धरना, प्रदर्शन किये इसके खिलाफ? खैर रहने दीजिये. कितने मुस्लिम ने फेसबुक पोस्ट लिखी इसके खिलाफ? चलिए देखते हैं कितने मुस्लिम इस पोस्ट को like करते हैं और कमेंट में इस massacre के खिलाफ कुछ लिखते हैं? आपकी किताब में क्या लिखा है, वो बाद में देखा जाएगा, लेकिन दुनिया यह तो देख ही रही है कि हो क्या रहा है. समझ जाएँ, समझा जाएँ, वरना मर्ज़ी है.
Man has evolved from double standard to triple, to quadruple, to multiple.Wow! Gr8...9..10...........!!

“#कॉमन_सिविल_कोड/ कुछ सवाल-कुछ जवाब”

हिन्दू ब्रिगेड हाहाकारी तरीके से कॉमन सिविल कोड के समर्थन में खड़ी है. मानना यह है इनका कि मुस्लिम समाज ने अलग सिविल कानून की आड़ में बहुत से फायदे ले रखे हैं और समाज को असंतुलित कर रखा है. मुस्लिम एक से ज़्यादा शादी करते हैं, बिन गिनती के बच्चे पैदा करते हैं. आदि-आदि. तो क्यूँ न एक साझा कानून बनाया जाए? क्रिमिनल कोड एक ही है मुल्क में. क़त्ल करे कोई तो सज़ा एक ही है, चाहे हिन्दू हो, चाहे मुसलमान, चाहे सिक्ख. लेकिन हिन्दू बेटी को पिता की सम्पति में जो अधिकार है, वो मुसलमान बेटी को नहीं है. तलाक के बाद हिन्दू पत्नी को पति से जो सहायता मिलती है, वैसी मुस्लिम स्त्री को नहीं है. तो क्यूँ न एक ही कानून हो? कॉमन सिविल कोड. अनेकता में एकता. इसमें कुछ पेच हैं. अनेकता में एकता के फोर्मुले पर ही सारा जोर है जबकि एकता में अनेकता बनाए रखना भी ज़रूरी है. जहाँ तक हो सके, किसी भी समाज के नेटिव फैब्रिक को नहीं छेड़ा जाए. आदिवासी समाज में कुछ अलग कायदे हैं. वहां घोटुल व्यवस्था है. शादी से पहले जवां लड़के-लड़कियां एक साझे हाल में जीवन के नियम सीखते हैं. सेक्स भी. प्रैक्टिकल. आपका बड़ा से बड़ा स्कू...
झूठ है कि लोग चढ़ते सूरज को सलाम करते हैं. लोग चढ़ते नहीं, चढ़े सूरज को सलाम करते हैं. कीमती वो व्यक्ति है जो चढ़े नहीं, चढ़ते नहीं, अँधेरे में छुपे सूरज की क्षमता/ पोटेंशियल पहचाने.
जो भी मित्र पूछते हैं कि मोदी का विरोध करता हूँ मैं, तो फिर विकल्प क्या है, उनसे उल्टा पूछना चाहता हूँ मैं कि मोदी के अलावा भारत बुद्धि, कौशल, क्षमता से विहीन है क्या? खुद में सम्भावना क्यूँ नहीं तलाशते आप? अन्यथा बन्दा तो हमेशा हाज़िर-नाज़िर है. आप स्टार्ट-up फाइनेंस arrange कीजिये, बाकी सब मैं पेश करता हूँ.
आमिर खान-इन-दंगल---- म्हारी छोरियां छोरों से कम हैं क्या? एक ख़बर----मेट्रो में  90 प्रतिशत पॉकेट-मारी महिलाओं ने की. 
हम भारतीय है, भारतवर्ष महान है, विश्व-गुरु है. मतलब हम महान हैं. विश्व-गुरु हैं हम. झूठे हैं, मक्कार है, कुत्ते हैं, कमीने हैं, कंजर हैं वो लोग, जो यह अफवाह फैलाते हैं कि हम अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड में बसने को मरे जाते हैं.
हर सरकार कहती है कि वो गरीब के लिए है. मतलब साफ़ है, अमीर होना लोकतंत्र की धारणा के खिलाफ है. अमीर और मध्यम वर्गीय अमीर का वोट खारिज़ कर देना चाहिए. अब्बी के अब्बी. नहीं? बताएं आप
मैं हर तथा-कथित धर्म के खिलाफ हूँ, एक नहीं हजारों बार लिख चुका हूँ....लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि किसी भी व्यवस्था में यदि ज़रा सा भी कुछ अच्छा हो तो वो न लिया जाए. क्या मैं नुसरत फ़तेह अली का गाना इसलिए नापसंद कर दूं कि वो पाकिस्तानी थे और मुसलमान भी? मैं ऐसा नहीं कर सकता. आज-कल मीशा शफी के गाने बहुत सुनता हूँ मैं. पाकिस्तानी हैं और मुस्लिम भी. पाकिस्तान की अचार-मसाले बनाने वाली कंपनी है "शान". इसके कुछ अचार हमें इतने पसन्द हैं कि हर "ट्रेड फेयर" में हम अपनी ट्राली इन्ही के सामान से भर लेते हैं. मेरी मित्र Veena Sharma अक्सर पाकिस्तानी ड्रामों की तारीफ लिखती हैं. एक टीवी प्रोग्राम है पाकिस्तान का "हस्बेहाल", बहुत पसंद है मुझे. एक हास्य कलाकार हैं 'अज़ीज़ी', बहुत पसंद हैं मुझे. हसन निसार साहेब भी कहीं पसंद, कहीं नापसंद हैं मुझे. मैं तो एक वाक्य में से भी किसी एक शब्द को ना-पसंद और बाकी शब्दों को पसंद कर सकता हूँ. मेरी पसंद नापसंद बहुत पॉइंटेड है, कृपा करके समझें.
ज़बरदस्त ब्रांडिंग से घटिया प्रोडक्ट धड़ल्ले से कैसे बेचा जा सकता है, बेकार बर्गर, पिज़्ज़ा और जहरीले कोक ही इसकी मिसाल नहीं है.......निर्मल बाबा और नरेन्द्र बाबा भी है.