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आइये, हम सलेक्टिव बनना-बनाना छोड़ दें/ मंदी...बेरोज़गारी...और हमारे महान धर्म

"आइये, हम सलेक्टिव बनना-बनाना छोड़ दें"

"#मंदी...#बेरोज़गारी...और हमारे महान धर्म"

मोमिन भाई को और लिबरल बहन को ज्यादा ही चिंता है आर्थिक मंदी की आज कल.....वैरी गुड...चिंता होनी चाहिए, सबको होनी चाहिए. 

बेरोजगारी पैदा हो रही है...होगी ही. जब आपने बच्चों की लाइन लगाई थी तो किसी से पूछा था कि इनको रोज़गार कैसे मिलेगा?

अल्लाह देगा...भगवान देगा...
"जिसने मुंह पैदा किये हैं, वो रिज़क भी देगा"
"वो भूखा उठाता है, लेकिन भूखा सुलाता नहीं है" 

ले लो फिर उसी से...फिर काहे सरकार को कोस रहे हो? 

तुम्हे पता ही नहीं कि जैसे-जैसे.....आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस का दखल बढेगा दुनिया में, 'इंसानी मूर्खता' की ज़रूरत घटती जाएगी. 

जो काम एक रोबोट इन्सान से कहीं ज्यादा दक्षता से कर सकता है, कहीं कम खर्चे में कर सकता है,  उसके लिए कोई क्यों ख्वाह्म्खाह इंसानों का बोझा ढोयेगा? 

विज्ञान के साथ-साथ दुनिया बदलती जाने वाली है. जनसंख्या, वाहियात जनसंख्या, अनाप-शनाप जनसंख्या खुद ही मर जाएगी. कोई न देने वाला तुम्हें रोज़गार? 

तुम्हारी इस पृथ्वी पर कोई बहुत ज़रूरत ही नहीं रह जानी अगले कुछ सालों में. इंसानी लेबर समय-बाह्य होती जाएगी समय के साथ-साथ. ऐसे में ये जो बच्चों की लाइन लगा रखी है, यह खुद ही आत्म-घात कर लेगी. और  इसके लिए कोई मोदी ज़िम्मेदार नहीं है, कोई भी सरकार ज़िम्मेदार नहीं है, तुम खुद हो ज़िम्मेदार. 

सरकार से इत्ती ज्यादा उम्मीद रखना सिर्फ मूर्खता है.  चूँकि रोज़गार हो, जीवन के बाकी आयाम हों, ये बहुत से ऐसे फैक्टर पर निर्भर हैं जिन पर सरकार का कोई बस ही नहीं है. जैसे रोबोटीकरण है, इस को कोई सरकार कितना रोक पायेगी? मुझे नहीं लगता कि सरकार के हाथ में कुछ ज्यादा है इस क्षेत्र में. जो तकनीक आ जाती है, बस आ जाती है. उसे फिर कौन रोक पाता है?

और रोबोट के आने के बाद इंसान खाली होने ही वाला है. इसे कोई नहीं रोक पायेगा. 

लेकिन सरकार आपको क्यों बताये यह सब? वो नहीं बताएगी. चूँकि सच सुनने-समझने को आप तैयार ही नहीं होंगे.

मंदी बिलकुल मुद्दा है. होना चाहिए लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि "इस्लाम" और "गैर-इस्लाम"  मुद्दा नहीं है. वो भी मुद्दा है. बड़ा मुद्दा है. पूरी दुनिया में मुद्दा है.  कश्मीर भी मुद्दा है. फिलस्तीन मुद्दा है.  रोहिंग्या मुस्लिम मुद्दा  है. अमेरका में ट्रम्प  का आना मुद्दा है.   जो इन मुद्दों से आंख चुराए, वो मूर्ख है. 

सो यह एकतरफा बात मत कीजिये मोमिन भाई. लिबरल बहनिया. 
सब मुद्दे हैं.  सेलेक्टिव मत बनें. 

हमें वैज्ञानिक समाज चाहिए. हमें बच्चे नहीं चाहियें. हमें कैसा भी धर्म/ दीन/ मजहब नहीं चाहिए. हमें समृद्ध समाज  चाहिए.

उसके लिए आपको शुरुआत करनी होगी इस्लाम के खात्मे से. चूँकि जब तक आप इस्लाम को नहीं ललकारेंगे तब तक बाकी सब दीन/धर्म भी इस्लाम जैसे बने रहेंगे चूँकि उनको इस्लाम का मुकाबला इसी तरह से करना समझ में आता है. लेकिन आपको तर्क से करना है मुकाबला सबका. शुरुआत इस्लाम से करें, चूँकि वो सबसे ज्यादा आदिम है. कैसे है? उसके लिए गूगल करें, कुरान ऑनलाइन है, खुद देख लीजिये कि मोहम्मद साहेब क्या कह गए हैं.   

सब को वैज्ञानिकता के धरातल पे ला पटकें..... सब दम तोड़ देंगे. क्या इस्लाम? क्या हिंदुत्व? क्या कुछ भी और? 

आईये कुछ उस तरह से हिम्मत करें. यह सेलेक्टिव बनना-बनाना छोड़ दें.

नमन...तुषार कॉस्मिक

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