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इस्लाम का विरोध सही है, वो एक brutal force है, लेकिन इसका मतलब क्या यह है कि आप मोहम्मद के खिलाफ राम को खड़ा कर दें. कुछ नहीं है राम में ऐसा जो पूजनीय हो. फिर किस्से कहानी है बस. कौन बन्दर उड़ता है? कौन भालू बोलता है? बचकानी कहानी है. और किसी ने नहीं दीये जलाये , जब राम लौटे, वो तो भरत का राजकीय आदेश था कि ऐसा किया जाये. पढ़ लीजिये वाल्मीकि रामायण. तर्क प्रयोग करें थोडा. बस एक ज्वर पैदा हो गया राम राम का. वो इसलिए कि इस्लाम बावला है तो हमें भी बावला होना है, इस्लाम से भी बड़ा. यह समाज सही दिशा में जा रहा था जो इस तरह के किस्से कहानी को हलके में लेता था, तभी तो बड़े आराम से PK जैसी फिल्म बन पाई यहाँ, तभी लोग राम के खिलाफ, कृष्ण के खिलाफ लिखते, बोलते आये हैं. यह इस समाज की गरिमा थी. यह इस समाज की अच्छाई थी लेकिन अब ऐसा करना गुनाह हो गया है. नई पीढ़ी के नाम भी लोग राम लाल, शाम लाल नहीं रखते. गुणात्मक नाम रखने लगे थे. जैसे तेजस, जलज, अपूर्व. समाज का उत्थान था यह. वो पुराणी धारणाओं को विदा कर रहा था. लेकिन अब यह जो ज्वार पैदा हुआ है, यह इस समाज को downfall की तरफ धकेल रहा है. नई पीढ़ी को को खुलापण दीजिये. वैचारिक खुलापन. यह क्या पोंगापंथी, पुरातन-पंथी की तरफ धकेल रहे हैं? इस्लाम पकड़ के बैठा है १४५० साल पुराणी कोई किताब तो हम उससे भी पुराणी किताब पकड़ के बैठेंगे. इस्लाम अपने किस्सों को सच मानता है, हम अपने किस्सों को सच मानेंगे. इस्लाम के पास काबा है , हम राम मंदिर बनायेंगे. इस्लाम के पास अल्लाह है, हमारे पास राम है. हमने इसल्म का मुकाबला करना है तो हम इस्लाम जैसे ही बनेंगे. यह सब और कुछ नहीं है. थोडा दिमाग लगायें तो बात समझ में आएगी.
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