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तारेक फ़तेह साहेब बताते हैं कि---

तारेक फ़तेह साहेब बताते हैं कि मोहम्मद साहेब के मरते ही मुस्लिमों में झगड़े शुरू हो गए थे. उनका शव अठारह घंटे रखा रहा लेकिन उनको 'नमाज़-ए-जनाज़ा' तक नसीब नहीं हुई. फिर उनकी सारी फॅमिली को मुसलमानों ने क़त्ल किया. और पूरी दुनिया में दूसरी मस्ज़िद भारत में बनी. दक्षिण के किसी हिन्दू राजा ने ज़मीन दी मस्ज़िद बनाने को, जिसके लिए दुनिया के तमाम मुसलमानों को शुक्रगुजार होना चाहिए. मेरा कहना बस इतना है कि यह सब निश्चित ही खोज का विषय है.

आरक्षण पर ओशो से मेरा मत विरोध

प्रस्तुत लेख में मैं आरक्षण के विषय में उनके और फिर बाद में अपने ख्यालात पेश कर रहा हूँ.....ओशो आरक्षण  का समर्थन करते हैं और मैं विरोध...पढ़िए, आशा है अच्छा लगेगा----- "ओशो की दृष्टि में आरक्षण" यही ब्राह्मण.... इस देश में, इस देश की बड़ी से बड़ी संख्या शूद्रों को सता रहे हैं, सदियों से........... ये कैसे शान्त लोग हैं?........ और अभी भी इनका दिल नहीं भरा, अभी भी वही उपद्रव जारी है....... अभी सारे देश में आग फैलती जाती है.... और गुजरात से क्यों शुरू होती है आग?...... पहले भी गुजरात से शुरू हुई थी, तब ये जनता के बुद्धू सिर पर आ गये थे, अब फिर गुजरात से शुरू हुई है.... गुजरात से शुरू होने का कारण साफ़ है..... ये ‘’महात्मा गाँधी’’ के शिक्षण का परिणाम है, वे दमन सिखा गये हैं, और सबसे ज्यादा गुजरात ने उनको माना है, क्यों कि गुजरात के अहंकार को बड़ी तृप्ति मिली है, की गुजरात का बेटा और पूरे भारत का बाप हो गया..... अब और क्या चाहिए? गुजराती का दिल बहुत खुश हुआ, उसने जल्दी से खादी पहन ली. मगर खादी के भीतर तो वही आदमी है जो पहले था, महात्मा गाँधी के भीतर खुद वही आदमी था जो पहले था, उस...

“नया समाज-1”

मैंने घोषणा की हैं मैं अपना गुरु खुद हूँ, मुझे किसी का हुक्मनामा नहीं चाहिए मैं अपना पैगम्बर खुद हूँ, मुझे किसी की हिदायत  नहीं चाहिए मैं अपना मसीहा खुद हूँ, किसी और की कमांडमेंट  की क्या ज़रुरत? मैं स्वयम ब्रह्म हूँ, मैं खुद खुदा हूँ खुद का, मुझे क्या ज़रुरत  पुराण कुरान की? मैं स्वयं की रोशनी स्वयं हूँ, मुझे शताब्दियों, सहस्त्राब्दियों पुराने व्यक्तियों की आँखों से नहीं, खुद की आँखों से जीना है बड़े साधारण शब्द हैं मेरे ..लेकिन काश कि आप भी यह सब कह पाते! दुनिया चंद पलों में बदल जायेगी. इन्सान जिस जन्नत का हकदार है, वो दिनों में नसीब होगी मुल्ले, पण्डे, पुजारी, पादरी विदा हो जायेंगे मंदर, मसीत, गुरुद्वारे, गिरजे बस देखने भर की चीज़ रह जायेंगे हिन्दू मुस्लिम, इसाई आदि का ठप्पा लोग उतार फेंकेंगे सदियों की गुलामी से आज़ादी लोग आज के हिसाब से जीयेंगे..... किसी किताब से नहीं बंधेंगे किताब हो, इतिहास हो, बस उसका प्रयोग करेंगे....जो सीखना है सीखेंगे उनसे लेकिन इतिहास की गुलामी कभी स्वीकार नहीं करेंगे   बहस इस बात की नहीं होगी कि मेरी किताब में यह लिखा ह...

नया समाज-2

मैं लिख रहा हूँ अक्सर कि एक सीमा के बाद निजी सम्पति अगली पीढी को नहीं जानी चाहिए.......बहुत मित्र तो इसे वामपंथ/ कम्युनिस्ट सोच कह कर ही खारिज कर रहे हैं.....आपको एक मिसाल देता हूँ......भारत में ज़मींदारी खत्म हुई कोई साठ साल पहले......पहले जो भी ज़मीन का मालिक था वोही रहता था...लेकिन कानून बदला गया....अब जो खेती कर रहा था उसे मालिक जैसे हक़ दिए गए.....उसे “भुमीदार” कहा जाने लगा...यह एक बड़ा बदलाव आया...."ज़मींदार से भुमिदार". भुमिदार ज़रूरी नहीं मालिक हो... वो खेती मज़दूर भी हो सकता था....वो बस खेती करता होना चाहिए किसी भूभाग पर....उसे हटा नहीं सकते....वो लगान देगा...किराया देगा...लेकिन उसकी अगली पीढी भी यदि चाहे तो खेती करेगी वहीं. कल अगर ज़मीन को सरकार छीन ले, अधिग्रहित कर ले तो उसका मुआवज़ा भी भुमिदार को मिलेगा यह था बड़ा फर्क यही फर्क मैं चाहता हूँ बाकी प्रॉपर्टी में आये......पूँजी पीढी दर पीढी ही सफर न करती रहे...चंद खानदानों की मल्कियत ही न बनी रहे ...एक सीमा के बाद पूंजी पब्लिक डोमेन में जानी चाहिए इसे दूसरे ढंग से समझें....आप कोई इजाद करते हैं...आपको पेटेंट मिल सकता...

कानूनी दांव पेच—भाग 3

बड़े जजों के नाम के आगे जस्टिस लिखा जाता है. जैसे जस्टिस ढींगरा, जस्टिस काटजू . बकवास. उपहार काण्ड में सुप्रीम कोर्ट के फैसले में कितना न्याय हुआ है, आप सबके सामने है. कितने ही लोग मारे गए और मालिकों को मात्र जुर्माना. वो भी ऐसा कि उनके कान पर जूं न रेंगे. अबे, यदि वो दोषी हैं तो जेल भेजो  और नहीं हैं तो छोड़ दो, यह पैसे लेने का क्या ड्रामा है? लेकिन दोषी तो वो हैं, तभी तो ज़ुर्माना किया है. हाँ, अमीर हैं सो उनकी सजा को जुर्माने तक  ही सीमित किया गया है. बच्चा  भी समझता है सिवा सुप्रीम कोर्ट के.  अमीर हो तो पैसे लेकर छोड़ दो और गरीब हो तो लटका दो.....यह इन्साफ है या रिश्वतखोरी? पीछे सुना है कि भारतीय जज समाज की सामूहिक चेतना (Collective Consciousness of the society) की संतुष्टि के हिसाब से फैसले देने लगे हैं. लानत है. फैसले कानून के हिसाब से, तथ्यों और तर्कों के हिसाब से दिए जाने चाहिए या समाज क्या सोचता समझता है उसके हिसाब से?  समाज ने तो सुकरात को ज़हर पिलवा दिया, जीसस को सूली पर टंगवा दिया, जॉन ऑफ़ आर्क को जिंदा जलवा दिया, सब फैसले उस समय की अदालतों ने दिए...

ज़ाहिर के परे

सेठ जी फोन पर व्यस्त थे........उनके केबिन में कुछ ग्राहक दाख़िल हुए लेकिन सेठ जी की बात फोन पर ज़ारी रही......लाखों के सौदे की बात थी....फिर करोड़ों तक जा पहुँची.........फोन पर ही करोड़ों की डील निबटा दी उन्होंने......ग्राहक अपनी बारी आने के इंतज़ार में उतावले भी हो रहे थे....लेकिन अंदर ही अंदर प्रभावित भी हो रहे थे........ इतने में ही एक साधारण सा दिखने वाला आदमी दाख़िल हुआ.........वो कुछ देर खड़ा रहा....फिर सेठ जी को टोका, लेकिन सेठ जी ने उसे डांट दिया, बोले, "देख नहीं रहे भाई , अभी बिजी हूँ"......वो आदमी थोड़ी देर खड़ा रहा, फिर से उसने सेठ जी को टोका, सेठ जी ने फिर से उसे डपट दिया............सेठ जी फिर व्यस्त हो गए......अब उस आदमी से रहा न गया, वो चिल्ला कर बोला , “सेठ जी, MTNL से आया हूँ, लाइनमैन हूँ, अगर आपकी बात खत्म हो गई हो तो जिस फोन  से  आप  बात कर रहे  हैं, उसका  कनेक्शन जोड़ दूं?” आप हंस लीजिये, लेकिन यह एक बहुत ही सीरियस मामला है. पुलिस वाले यदि किसी पैसे झड़ने वाली आसामी को पकड़ लेते हैं तो उसके सामने किसी गरीब को ख्वाह-म-खाह कूटते-पीटते रहते हैं......वो ...

भूमि अधिग्रहण

अभी अभी आज़ादी दिवस मना के हटा है मुल्क.....आपको पता हो न हो शायद कि आजादी के साथ अंग्रेज़ों के जमाने के बनाये कानून भी दुबारा देखने की ज़रूरत थी, लेकिन नहीं देखे, नहीं बदले ...इतने उल्लू के पट्ठे थे हमारे नेता.....बेवकूफ , जाहिल, काहिल, बे-ईमान.....सब के सब.....सबूत देता हूँ....सन 1897 का कानून था जमीन अधिग्रहण का......अँगरेज़ को जब जरूरत हो, जितनी ज़रुरत हो वो किसान से उसकी ज़मीन छीन लेता था...कोई मुआवज़ा नहीं, कोई ज़मीन के बदले ज़मीन नहीं, कोई बदले में रोज़गार व्यवस्था नहीं...भाड़ में जाओ तुम. आप हैरान हो जायेंगे कि मुल्क सन सैतालिस में आज़ाद हुआ माना जाता है लेकिन यह कानून अभी सन दो हज़ार तेरह में बदला गया. पहले इस बदलाव से पहले की कुछ झलकियाँ आपको पेश करता हूँ. हमारी सरकारों ने इस भूमि  अधिग्रहण कानून का खूब दुरुप्रयोग किया. सरकारी छत्रछाया में खूब पैसा बनाया गया ज़मीन छीन छीन कर किसान से. उसे या तो कुछ दिया ही नहीं गया या दिया भी गया तो ऊँट के मुंह में जीरा. भूमि अधिग्रहण कानून से बस  किसान की ज़िंदगी पर ग्रहण ही लगाया गया. कहते हैं भाखड़ा डैम के विस्थापितों को आज तक नहीं बसाया ग...

कानूनी दांव पेच--- भाग -2

इस भाग में मैं आपको अपने-आपके  जीवन के इर्द गिर्द घटने वाले, घटने वाले कानूनी मसलों और मिसलों और मसालों की बात करूंगा. 1) शायद याद हो आपको, एक दौर था दिल्ली में जगह जगह लाटरी के स्टाल हुआ करते थे. लोग सब धंधे छोड़ छाड़ लाटरी में लिप्त थे. जिनके पास दुकानें थीं उन्होंने, अपने चलते चलाते धंधे बंद कर अपनी जगह लाटरी के काउंटर वालों को किराए पर देनी शुरू कर दी थीं. लोग सारा सारा दिन लाटरी खेलते थे. जमघट लगा रहता था. कईयों के घर बर्बाद हो गए. फिर कुछ लोगों ने आत्महत्या तक कर ली. सरकार के कान पर जूं सरक गई. लाटरी बंद हो गई दिल्ली में. लेकिन हरियाणा में चलती रही. लोग बॉर्डर पार कर लाटरी खेलने जाने लगे लेकिन वो सब  चला  नहीं ज़्यादा देर. उसके बाद वो बुखार  उतर गया. यह एक तल्ख़ मिसाल है कि हमारी सरकारें किस कदर बेवकूफ होती हें. आप सोच सकते हैं कि मैं यह गुज़रा दौर क्यों याद कर करवा रहा हूँ. वजह है. वजह यह है कि लाटरी आज भी जिंदा है. जैसे रावण के सर काटो तो फिर जुड़ जाते कहे जाते हैं. जैसे रक्तबीज. सर काटो तो और पैदा हो जाते हैं.आज लाटरी ने शक्ल बदल ली है. मुखौटा लगा लिया है निव...

मुझे प्रधान मंत्री बना दे रे...ओ भैया दीवाने

मुझे कोई कह रहा था कि मुझे छोटे-मोटे  चुनाव जीतने चाहिए पहले, फिर प्रधान मंत्री  पद तक की सोचनी चाहिए. ठीक है  यार, जहाँ सुई का काम हो,  वहां तलवार नहीं चलानी चाहिए जहाँ बन्दूक का काम हो, वहां तोप नहीं चलानी चाहिए लेकिन इससे उल्टा भी तो सही है, आप तलवार से सुई का काम लोगे तो वो भी तो गलत होगा, आप तोप से बन्दूक का काम लोगे तो वो भी तो सही नहीं होगा हम तोप हैं भाई जी, इंडिया की होप हैं  वैसे मैंने सुना है भारत में चुनाव हारे हुए लोग भी मंत्री वन्त्री बन जाया करते हैं और बिना चुनाव लड़े भी  प्रधान संत्री मंत्री  मैं तो फिर भी प्रधानमंत्री पद की  दावेदारी बाकायदा ठोक रहा हूँ  हूँ कौन भाई मैं? मैं आप हूँ मित्र, आप. लोक तंत्र है न भाई...लोगों का तंत्र...हम लोगों का तन्त्र  ऐसा तन्त्र जिसमें कोई भी प्रधानमंत्री बन सकता हो  तो फिर मैं क्यों नहीं? इस “मैं” में आप खुद को देखिये, खोजिये, खो मत  जईये , खोजिये

डरपोक धर्म

जिस तरह से किसी को मंदिर मस्ज़िद में दिन रात यह कहने का हक़ है कि भगवान, अल्लाह, गॉड ऐसा है, वैसा है...... उसके अवतार, उसके पैगम्बर ये  हैं, वे हैं, उसी तरह से किसी को भी यह कहने का हक़ है कि वो इन सब बातों को गलत मानता है.....और उसको हक़ है यह  कहने  का  कि  उसकी नज़र में सही क्या है...... सेकुलरिज्म का और फ्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेशन का मतलब यही है........इसमें तथाकथित मदिरवाद, मस्ज़िदवाद गुरुद्वारावाद की यदि छूट है तो इसमें इन सब को न मानने की भी छूट है......आप भगवान, अल्लाह, दीन, धर्म, मज़हब के बारे में अपना मत रख सकते हैं. आप किसी भी चली आ रही परिपाटी को "हाँ" कर सकते हैं और मैं न कर सकता हूँ......आप उसके समर्थन में खड़े हो सकते हैं.....मैं उसके विरोध में खड़ा हो सकता हूँ.....आपके हिसाब से हिन्दू या मुस्लिम या ईसाई जीवन पद्धति सही हो सकती है, मेरे हिसाब से कोई और जीवन पद्धति .....आप मेरी विचारधारा को गलत कह सकते हाँ, मैं आपकी विचार धारा को....इसमें तकलीफ क्या है? लेकिन तकलीफ है, तथा कथित धार्मिक को बड़ी तकलीफ है? उसे बड़ा डर है....सदियों से जमी दुकानदारी गिर न जाए......

THREE IMPORTANT WORDS

There are 3 words in English language. 1) Proactive. 2) Active 3) Reactive These are not merely words but life philosophies. I explain. 1) Proactive is an individual who gets every bit of his car up-to-date. He will timely get air pressure, balancing, alignment of tyres checked & corrected. He will get brake oil, engine oil, gear oil changed/ fulfilled time to time. He will get his car thoroughly serviced on-time.  2) Active is an individual who gets his car repaired  on slight recommendation of the mechanic. 3) And  reactive is an individual who gets his car repaired after meeting with an accident due to some malfunctioning of the same. In-fact the word re-pair was meant for such an individual. His vehicle gets  'im-paired', so had to be 're-paired'. Which one of these you are, now find out. Namas- car....Copy-right

गुरु शिष्य सम्बन्ध — कुछ अनछूए पहलु

शिष्य  गुरु को माफ़ नहीं करते...........जीसस को जुदास ने बेचा था, उनके परम शिष्यों में से एक था......ओशो का अमेरिका स्थित कम्यून  जो नष्ट हुआ उसमें मा शीला का बड़ा हाथ था....... उनकी सबसे प्रिय शिष्या थी अक्सर आप देखते हैं कि आप किसी को कोई काम सिखाओ ...वो आप ही के सामने अपनी दूकान सजा कर बैठ जाता है........इसलिए तो सयाने व्यापारी  अपने कर्मचारियों के लिए अलग केबिन बनाते है.....खुद से दूर रखते हैं........अपने कारोबार में जितना पर्दा रख सकते हैं, रखते हैं. गुरु भी समझते हैं इस बात को....वो अक्सर शिष्यों को खूब घिसते हैं, बेंतेहा पिसते हैं ..........कभी कार मिस्त्री के पास काम करने वाले लड़कों को देखो...वो उस्ताद की मार भी खाते हैं और गाली भी और गधों की तरह काम भी करते हैं........उनको काम जो सीखना है और गुरु भी गुरु घंटाल है, उसे भी पता है कि जितना काम ले सकूं, ले लूं.........खुर्राट वकील के पास काम करने वाले नए नए वकीलों को देखो.....उनसे मजदूरों की तरह काम लिया जाता है,.... निपट मजदूरी.....सालों घिसा जाता है उनको ऑस्कर वाइल्ड मुझे बहुत प्रिय हैं...... पता नहीं मेरे बाल...

पुलिस

बहुत रौला रप्पा है दिल्ली पुलिस के बारे में इन दिनों. रवि नाम का लड़का  काम करता था मेरे साथ कुछ साल पहले.....अभी आया दो तीन रोज़ पहले....किसी औरत ने छेड़छाड़ का केस दर्ज़ करवा दिया उस पर.....घबराया था.....मैंने केस पढ़ा एक दम बेजान.....बेतुके आरोप. जैसे किसी ने नशे में जो मन में आया लिख दिया हो...कोई सबूत नहीं.....कोई गवाह नहीं....कोई ऑडियो, विडियो रिकॉर्डिंग नहीं.....और साथ में पैसों के ले-दे  का भी ज़िक्र....आरोप कि रवि पैसे वापिस नहीं दे रहा  रवि ने बताया, “भैया, पैसों वाली बात सच है, मैंने इनके पचास हज़ार देने थे. साल भर से ब्याज दे रहा था..अभी नौकरी छूट गयी है सो दो महीने से ब्याज नहीं दे पाया....मैंने बोला दे दूंगा....कुछ इंतेज़ाम होते ही..पर बेसब्री में मेरे घर आकर गाली गलौच कर दी....इसीलिए ये केस दर्ज़ करवा दिया है” यह किस्सा सुनाने का एक मन्तव्य है. पुलिस के IO (Inspecting Officer) का रोल क्या होना चाहिए? यही न कि जो भी केस उसके हिस्से आये वो उसकी छानबीन करे. यहाँ मालूम क्या छानबीन होती है? पैसे कहाँ से मिल सकते हैं? पैसे कैसे लिए जा सकते हैं? थाने में IO खुद जज, ...

मेरी भोजन यात्रा

यात्रा वृतांत पढ़े होंगे, सुने होंगे आपने. आज भोजन वृतांत पढ़िए. यात्रा वृतांत जैसा ही है, बस फोकस भोजन पर है ...भोजन यात्रा ..मेरी भोजन यात्रा .....मन्तव्य मात्र पीना-खाना है और मेरे जीवन में आपको खुद के जीवन की झलकियाँ दिखाना है. चलिए फिर, चलते हैं. कहते हैं आदमी के दिल का रास्ता पेट से हो के गुजरता है... सही है ..... वैसे दिल के दौरे का रास्ता भी पेट से ही हो के गुजरता है और दिल का रास्ता पेट की बजाए पेट के थोड़ा नीचे से शोर्ट कट है. सीक्रेट है थोड़ा, लेकिन है. बचपने में बासी रोटी को पानी की छींट से हल्की गीली करके लाल मिर्च और नमक छिड़क कर दूसरी रोटी से रगड़ कर खाना याद है. और याद है रोटी खाना पानी में नमक और लाल मिर्च घोल के साथ ..हमारे घर में खाने-पीने की कभी कमी तो नहीं रही लेकिन वहां बठिंडा में कभी-कभी ऐसे भी खाते थे....एक बार घर से लड़ कर वहीं एक फैक्ट्री में मजदूरी की दिन भर, मजदूरों के साथ बैठ खाना खाया, अचार, हरी मिर्च और प्याज़ के साथ ...वो भी कभी भूला नहीं. आज भोजन-भट्ट तो नहीं हूँ लेकिन थोड़ा ज़्यादा खा जाता हूँ लेकिन जो खाता हूँ अच्छा खाता हूँ...कहते हैं थोड़ा ख...

कानूनी दाँव पेंच

एक समय था मुझे कानून की ABCD नहीं पता थी.......सुना था कि कचहरी और अस्पताल से भगवान दुश्मन को भी दूर रखे.......लोगों की उम्रें निकल जाती हैं........जवानी से बुढापे और बुढापे से लाश में तब्दील हो जाते हैं और जज सिर्फ तारीखें दे रहे होते हैं लेकिन मेरा जीवन.....मुझे कचहरी के चक्कर में पड़ना था सो पड़ गया .........शुरू में वकील से बात भी नहीं कर पाता था ठीक से.....वकील की बात को समझने की कोशिश करता लेकिन समझ नहीं पाता...जैसे डॉक्टर की लिखत को आप समझना चाहें भी तो नहीं समझ पाते वैसे ही वकील की बात का कोई मुंह सर निकालना चाहते हुए भी नहीं निकाल पाता एक वकील से असंतुष्ट हुआ, अधर में ही उसे छोड़ दूसरा पकड़ा......वो भी समझ नहीं आया ..तीसरा पकड़ा......कुछ पता नहीं था....तारीख का मतलब बस जैसे तैसे कचहरी में हाज़िरी देना ही समझता था तकरीबन तीन साल चला केस.....यह मेरी ज़िन्दगी का पहला केस था...और जायज़ केस था.....किसी से पैसे लेने थे....चेक का केस था और फिर भी मैं हार गया...... जब घर वापिस आया तो औंधा मुंह लेट गया, घंटों पड़ा रहा....गहन ग्लानि खुद को पढ़ा लिखा समझदार समझता था लेकिन एक कम पढ़े लिखे ...