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Qutab Minar Controversy: क्या मंदिर तोड़ कर बनवाई गई थी कुतुब मीनार?

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मुसलमान बहुत दुखी हैं कि बाबरी मस्ज़िद तोड़ दी गई. और ओवेसी बंधु अकसर एक्शन के रिएक्शन की बात करते हैं. क्या कोई मुसलमान यह देखने को राज़ी है कि कितने ही मंदिर तोड़-तोड़ कर मस्जिदें बनाई गईं. क़ुतुब मीनार असल में क्या है? सपरिवार क़ुतुब मीनार जाना हुआ. बहुत पहले पी. एन. ओक. साहेब की किताब पढ़ी थी, "भारतीय इतिहास की भयंकर भूलें", जिसमें वो ज़िक्र करते हैं कि बहुत सी ऐतिहासिक इमारतें जो मुगलों की बनाई कही जाती हैं, वो असल में हिन्दू राजाओं ने बनवाई थी. इन्हीं इमारतों में वो क़ुतुब मीनार का ज़िक्र भी करते हैं. मुझे उनके दिए कोई भी तर्क याद नहीं. लेकिन आज जब वहां जाना हुआ तो उनकी बहुत याद आई. "लौह स्तम्भ" के प्रांगण में घुसने से पहले ही जो 'परिचय पत्थर' पर लिखा है उसी ने दिमाग में उथल-पुथल मचा दी. लिखा है, “कुवुतल इस्लाम ( इस्लाम की शक्ति) नाम से प्रसिद्ध यह इमारत भारत में प्राचीनतम मस्ज़िद है. इसके दालान में प्रयुक्त खम्बे और दूसरी सामग्री सताईस हिन्दू और जैन मंदिर ध्वस्त करके प्राप्त की गई. मुख्य इमारत के सामने पांच मेहराबों की पंक्ति बाद में लगाई गई. ताकि इसमें इस्लामिक ...

सेक्युलरिज्म

सेक्युलरिज्म दुनिया के सबसे कीमती कांसेप्ट में से है. यह वही है जो मैंने लिखा कि सबको अपनी अपनी मूर्खताओं के साथ जीने का हक़ होना चाहिए, तब तक जब तक आप दूजों की जिंदगियों में दखल न दो. यह जो संघी इसके खिलाफ हैं, वो इडियट हैं. उनमें और मुस्लिम में ख़ास फर्क नही. वो कहते हैं कि हिंदुत्व सेक्युलर है. By Default. नहीं है. होना चाहिए. लेकिन नहीं है. मैं राम के खिलाफ बोलना चाहता हूँ कृष्ण के भी. काली माता के भी. गौरी माता के भी. झंडे वाली माता के भी. कुत्ते वाली माता के भी. मुझे मन्दिर देंगे बोलने के लिए? नहीं देंगे. सो टारगेट सेकुलरिज्म होना चाहिए किसी भी आइडियल समाज का. लेकिन यह देखने की बात है कि जो तबके/ दीन/ मज़हब By default हैं ही सेकुलरिज्म के खिलाफ. जैसे इस्लाम. उनको अगर आप सेकुलरिज्म के कांसेप्ट वाले समाज में डाल भी दोगे तो वो आपकी मूर्खता है. जैसे मैं नहीं हूँ हिन्दू. लेकिन अगर कोई मुझे हिन्दुत्व के कांसेप्ट में डाल भी देगा तो वो उसकी मूर्खता है. और यह गलती कर रहा है भारतीय समाज. और यह गलती दुनिया में और भी समाजों में हो रही है. खतरनाक गलती है.

आज़ादी - दो पहलु

१. "क्या हम में आज़ादी बर्दाशत करने का जिगरा है ?" यूनान, मिश्र, रोम मिट गए सब जहाँ से. यह सिर्फ सभ्यताएं ही नहीं मिटी, इनकी देवी-देवता भी मिट गए.  TROY फिल्म का दृश्य है,  Achilles हमला करता है तो विरोधियों के देवता 'अपोलो' की मूर्ति का भी सर कलम कर देता है. यहाँ भारत में सोमनाथ के मन्दिर पर आक्रमण हुआ, फिर अनेक मंदिर गिरा कर मस्ज़िद बना दिए गए. किसका क्या बिगाड़ लिया इन देवताओं ने? कुछ नहीं. कहना यह चाहता हूँ कि देवी-देवता भी हम इंसानों के साथ हैं.....हमारी वजह से हैं .....हमारे बनाए हैं.  भारत में कुछ ही मीलों की दूरी से बोली बदल जाते है....न सिर्फ बोली बदलती है....देवी-देवता भी बदल जाते हैं...ऐसे-ऐसे देवी-देवतायों के नाम है जिनको शायद ही उस इलाके से बहार किसी ने सुना हो.....जम्भेश्वर नाथ, मुक्तेश्वर नाथ...कुतिया देवी. झंडे वाली माता-डंडे वाली माता.  लेकिन बड़ी मान्यता होती है उन इलाकों में. कुछ मज़ारों की, कुछ मंदिरों. कुछ गुरुद्वारों की ख़ास-ख़ास मान्यता होती है.  न तो इन स्थानों से, न इन देवी-देवतायों से कुछ मिलता है, जो मिलता है, जो बनता है, जो ...

आइये, हम सलेक्टिव बनना-बनाना छोड़ दें/ मंदी...बेरोज़गारी...और हमारे महान धर्म

"आइये, हम सलेक्टिव बनना-बनाना छोड़ दें" "#मंदी...#बेरोज़गारी...और हमारे महान धर्म" मोमिन भाई को और लिबरल बहन को ज्यादा ही चिंता है आर्थिक मंदी की आज कल.....वैरी गुड...चिंता होनी चाहिए, सबको होनी चाहिए.  बेरोजगारी पैदा हो रही है...होगी ही. जब आपने बच्चों की लाइन लगाई थी तो किसी से पूछा था कि इनको रोज़गार कैसे मिलेगा? अल्लाह देगा...भगवान देगा... "जिसने मुंह पैदा किये हैं, वो रिज़क भी देगा" "वो भूखा उठाता है, लेकिन भूखा सुलाता नहीं है"  ले लो फिर उसी से...फिर काहे सरकार को कोस रहे हो?  तुम्हे पता ही नहीं कि जैसे-जैसे.....आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस का दखल बढेगा दुनिया में, 'इंसानी मूर्खता' की ज़रूरत घटती जाएगी.  जो काम एक रोबोट इन्सान से कहीं ज्यादा दक्षता से कर सकता है, कहीं कम खर्चे में कर सकता है,  उसके लिए कोई क्यों ख्वाह्म्खाह इंसानों का बोझा ढोयेगा?  विज्ञान के साथ-साथ दुनिया बदलती जाने वाली है. जनसंख्या, वाहियात जनसंख्या, अनाप-शनाप जनसंख्या खुद ही मर जाएगी. कोई न देने वाला तुम्हें रोज़गार?  तुम्हारी इस पृथ्वी पर कोई बहुत ज़...

तुम हो बलि का बकरा

पाकिस्तान की हालत देख कर, काबुल में ताज़ा धमाके में साठ से ज़्यादा मुसलमानों का मुसलमानों द्वारा क़त्ल देख कर, मुसलमानों की रक्त-रंजित  हिस्ट्री देख कर, मोहम्मद साहेब के अपने ही परिवार का मुसलमानों द्वारा कत्ल देख कर, मोहम्मद साहेब को समझ जाना चाहिए कि उनका बनाया हुआ दीन हीन है.  चलो उनको न भी समझ आये, मुसलमानों को समझ जाना चाहिए कि उनका दीन हीन है. चलो मुसलमानों को न भी समझ आये बाकी दुनिया को समझ जाना चाहिए कि मोहम्मद साहेब का बनाया हुआ दीन हीन है.  समझ जान चाहिए कि बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से होए?  और बाकी दुनिया में सब को तो नहीं लेकिन कुछ को तो समझ आने ही लगा है. उसी का नतीजा है कि इस्लाम  के खिलाफ ट्रम्प खड़ा हो जाता है, आरएसएस खड़ा हो जाता है, चीन खड़ा हो जाता है, म्यांमार का बौद्ध भिक्षु खड़ा हो जाता है.  लेकिन यह नतीजा अभी नाकाफी है. रोज़ 'अल्लाह-हू-अकबर' के नारे के साथ इंसानी जिस्म की हवा में उड़ती बोटियाँ  देखते-सुनते हुए भी कुछ लोग अंधे-बहरे बने हुए हैं.  कब तक  इस्लाम को सही-सही समझने के लिए अपनी बलि देते रहोगे?  न समझ...

मानव भविष्य -- #कश्मीर और #इस्लाम के सन्दर्भ में

आपको न #मुसलमान बन कर सोचना है और न ही #हिन्दू बन कर. आपको सिर्फ सोचना है. तटस्थ हो कर. और किसी भी घटना-दुर्घटना के पीछे इतिहास भी हो सकता है, यह भी देखना चाहिए, कोई आइडियोलॉजी भी हो सकती है, और वो आइडियोलॉजी खतरनाक भी हो सकती है,  यह भी देखना चाहिए.  शिकारी जब खुद शिकार बनने लगे तो वो चीखने लगता है, देखो मैं विक्टिम हूँ, मैं विक्टिम हूँ. इसे 'विक्टिम कार्ड' खेलना कहते हैं. चोर पकड़ा न जाए, इसलिए चोरी करने के बाद सबसे ज्यादा वोही चिल्लाता है, "चोर, चोर, पकड़ो, पकड़ो." ताकि कम से कम यह तय हो जाये कि वो चोर नहीं है. किसी का भी शक कम से कम उस पर न जाए. जब दो लोग लड़ रहे होते हैं तो दोनों एक जैसे लगते हैं, लोग अक्सर कमेंट करते हैं कि साले ये लड़ाके लोग हैं, लड़ते रहते हैं, वो इत्ती ज़हमत ही नहीं उठाते कि शायद उन में से कोई एक ऐसा भी हो सकता है, जो सही लड़ाई लड़ रहा हो. लोग समझते ही नहीं कि शायद कोई एक सिर्फ इसलिए लड़ रहा है कि उस पर अटैक किया जा रहा है. बार-बार किया जा रहा है. क्रिया की प्रतिक्रिया है. आपको जो मुसलामानों पर अत्याचार लग रहा है. वो उनकी अपनी करनी का फल है. व...
"सभी का खून है इस मिट्टी में शामिल, किसी के बाप का हिंदुस्तान थोड़ी है." मोमिन भाई बड़े जोश से मुस्लिम की कुर्बानियां, उपलब्धियां गिनवाते हुए कहते हैं. ठीक है भाई. दे तो दिया पाकिस्तान. आपकी कुर्बानियों, अहसानों का बदला. प्रॉपर्टी डीलर हैं क्या हम जो प्लाट काट-काट कर देते रहें आपको?

बकरीद

बेचारे बकरे की मां कब तक खैर मनाएगी. एक दिन ईद आयेगी.  "मौत का एक दिन मुअय्यन है, नींद क्यों रात भर आती नहीं."   और वो दिन बकरीद है. वैसे "बलि का बकरा" सिर्फ  बकरा ही नहीं बनता.  इस दिन बकरे ही नहीं और भी बहुत से जानवर काट दिए जाते हैं. कोई आसमानी बाप है. जिसका नाम "अल्लाह" है, वो बहुत खुश होता है इन जानवरों के काटे जाने से, वो जो सब जानवरों का जन्मदाता है. वो खुश होता है इन जानवरों का खून गलियों में, नालियों में बहता हुआ देख कर. वैरी गुड! साला खाना मांस खुद है, बीच में अल्लाह को ला रहे हैं. बे-ईमानी देखो ईमानदारों की.  फिर तर्क शुरू होता है कि सब्जियों में भी जान होती है तो क्या हर्ज़ है कि बकरा खा लिया? वैरी गुड! तुम्हारे  बेटा-बेटी में भी जान है, उसे भी जिबह कर दो और फिर खिला दो सारे समाज को. वो भी तो तुम्हें प्यारे  होंगे. उससे प्यारा शायद ही कुछ हो. अल्लाह को कुर्बानी देनी है न सबसे प्यारी चीज़ की तो वो कोई बकरा तो हो नहीं सकता. वो तुम्हारे बच्चे हो सकते हैं. उनकी दे दो क़ुरबानी. कोई बात नहीं, तुम निश्चिन्त रहो,  बीच में कानून नहीं...

मंदिर वहीं बनायेंगे

मोमिन भाई बड़ी मासूमियत से कहते हैं, "वहां राम मंदिर की जगह लाइब्रेरी बना लेते, अस्पताल बना लेते, कुछ भी आम-जन के फायदे की चीज़ बना लेते, लेकिन मानते ही नहीं." मैं तो बिलकुल सहमत हूँ. यही बात अगर आप काबा या गिरजे के लिए भी कहें तो ही Valid है?  मैं तो मानता हूँ. साले सब भूतिया राग हैं. कहिये ऐसे, कहा जैसे मैंने. कह सकते हैं?  अन्यथा आप सिर्फ एक मुस्लिम हैं. और चूँकि आप मुस्लिम हैं, इसीलिए वो हिन्दू हैं. इस तरह के हिन्दू हैं. हिन्दुत्व वाले हिन्दू हैं.  वो बात, मंदिर की है ही नहीं. बात है कल्चरल कनफ्लिक्ट की. मंदिर तोड़ के मस्जिद बनाईं गईं थीं यह एतिहासिक तथ्य  है. मंदिर मतलब अगलों की कल्चर तोड़ी गयी थी. अब वो तथा-कथित मस्जिद तोड़ कर मंदिर बनाया जाना है. तुमने उनका कल्चर तोडा, वो तुम्हारा कल्चर इनकार कर रहे हैं.   और वो तुम भी जानते हो.  असल में दुनिया को न तो तुम्हारे कल्चर की ज़रूरत है और न उनके. न इस्लाम की ज़रूरत है और न ही हिंदुत्व की. दुनिया धर्मों के बिना बड़े आराम से चल सकती है. कहीं बेहतर चल सकती है. सामाजिक नियमों को हमने कानूनी-जामा पहना रखा...

Zomato प्रकरण का संदेश

यदि समाज का कोई तबका (गैर-मुस्लिम)  दूसरे तबके (मुस्लिम) को बिज़नस नहीं देना चाहता तो  क्या गलत है बे? मर्जी उसकी. बिज़नस दे न दे. यदि समाज का कोई तबका (गैर-मुस्लिम)  दूसरे तबके (मुस्लिम) को किराए पर मकान नहीं देना चाहता तो क्या गलत है बे? मर्जी उसकी. जिसका मकान, वो दे न दे किराए पर.  तुम्हें पता है कि मुस्लिम अपनी बेटियों की शादियाँ नहीं करते गैर-मुस्लिम से? अपवाद मत गिनवाना.  तुम्हे पता है मुस्लिम काफिर के पूजा-स्थल में नहीं झुकते? काफिर के धर्म/मज़हब को कोई मान्यता नहीं देते?  तुम्हे पता है मुस्लिम में 'उम्मा' का कांसेप्ट है? 'उम्मा' मतलब इस्लामिक तबका. मुस्लिम अपने आप को उम्मा से जोड़ता है. न तुम्हारे मुल्क से, न तुम्हारे समाज से, न तुम्हारे मज़हब से. तुम आस्तिक, नास्तिक, हिन्दू, सिक्ख, जैन, सवर्ण, दलित  जो मर्ज़ी होवो, उनकी उम्मत से बाहर हो. तुम काफिर हो. तुम्हारे खिलाफ हिंसा की हिदायत हैं कुरान में.  इसीलिए मुस्लिम ने  काफिरों की पूरी दुनिया में भसड़ मचा रखा है? अल्लाह-हो-अकबर. Boom. फटाक. खुद-कुश. ख्वाहमखाह शोर कर रखा है कि किसी ...

फिलोसोफी की लड़ाई

अगर तुम्हें लगता है कि ये कोई तीर तलवार की जंग थी तो तुम गलत हो. अगर तुम्हें लगता है कि ये कोई तोप बन्दूक की लड़ाई है तो तुम गलत हो. अगर तुम्हें लगता है कि ये कैसे भी अस्त्र-शस्त्र की लड़ाई है तो तुम गलत हो. न...न......फिलोसोफी की लड़ाई है...आइडियोलॉजी की लड़ाई है.....ये किताब की लड़ाई है.....ये तो शास्त्र की लड़ाई है.. ये कुरआन और पुराण की लड़ाई है......दोनों तुम्हारी अक्ल पर सवार हैं सवार है कि किसी भी तरह तुम्हारी अक्ल का स्टीयरिंग थाम लें. सिक्खी में तो कहते है कि जो मन-मुख है वो गलत है और जो गुर-मुख है वो सही है.....तुम्हे पता है पंजाबी लिपि को क्या कहते हैं? गुरमुखी. मतलब आपका मुख गुरु की तरफ ही होना चाहिए...... असल में हर कोई यही चाहता है. इस्लाम तो इस्लाम से खारिज आदमी को वाजिबुल-कत्ल मानता है....समझे? क्या है ये सब? इस सब में तुम्हें लगता है कि 42 सैनिक मारे जाने कोई बड़ी बात है? इतिहास उठा कर देखो. लाल है. और वजह है शास्त्र. दीखता है तुम्हें अस्त्र.शस्त्र. चूँकि तुम बेवकूफ हो. चूँकि जब शास्त्र पर प्रहार होगा तो तुम्हारी अपनी अक्ल पर प्रहार होगा...वो तुम पर ...

विज्ञान_धर्म_और_हम

वैसे तो प्लास्टिक भी विज्ञान से आता है लेकिन प्लास्टिक या विज्ञान ये थोड़ी न कह रहा है कि प्लास्टिक प्रयोग होना ही चाहिए. कार भी विज्ञान से आती है, लेकिन अगर ड्राईवर गधा चलाने जितनी भी अक्ल न रखता हो और एक्सीडेंट कर दे तो गलती विज्ञान की है या ड्राईवर की ? एक मित्र कह रहे थे कि धर्म के विदा होने से कोई लाभ नहीं होगा....आदमी हिंसक इसलिए है चूँकि वो काम/क्रोध/लोभ आदि से बंधा है सो मानव-समस्याओं की असल वजह धर्म नहीं हैं. अरे, इन्सान तो है ही जानवर. बात यह है कि जंगल से यहाँ तक उसने सही सफर भी किया है और गलत भी. ज्ञान/ समाज विज्ञान / मनोविज्ञान / चिकित्सा विज्ञान..... यह विज्ञान... वह विज्ञान.... इन्सान अगर सब तरफ से वैज्ञानिक हो जाये तो उसके लोभ / मोह आदि को भी सही दिशा दी जा सकती है. फिर क्या दिक्कत है? दिक्कत हैं ये धर्म! उदाहरण है कोई भी रेड लाइट. रेड लाइट अगर सही है तो सब सही चलेंगे/अगर खराब है तो सब इडियट हो जायेंगे. पॉइंट यह है कि इन्सान तो है जानवर, जंगली, कंक्रीट के जंगल का वासी.....लेकिन हमने जो भी विज्ञान विकसित किया है वो बहुत, बहुत हमारे जीवन क...

धर्म बेकार है. अक्ल इससे बेहतर है

हम कहते हैं वसुधैव कुटुम्बकम, बहुत अच्छी बात है. लेकिन वसुधा की तो वाट लगा रखी है हमने. कल अगर यह धरा जलने लगे, पिघलने लगे और हमें कोई ग्रह मिल जाए तो क्या जो लोग भी जा पाएं, उनको वहां जाना चाहिए कि नहीं; फिर कैसे रहेगी वसुधा हमारी कुटुम्ब. और अगर बहुत से लोगों को बचाने के लिए इसे किसी की बली भी देनी पड़े तो भी जायज़ समझा जा सकता है. तो इस तरह सब कुछ वक्त / ज़रूरत / दिशा-दशा / टाइम-स्पेस के अनुसार ही तय किया जा सकता है। और क्या तय करना है, वही अक्ल का रोल है। तो धर्म शब्द बेकार है. अक्ल इससे बेहतर शब्द है. धर्म का connotation मन्दिर, मस्जिद, चर्च...पंडित, ग्रन्थी, मौलवी इत्यादि को लिए खड़ा है....ईश्वर/अल्लाह को लिए खड़ा है......क़ुरान/पुराण को लिए खड़ा है. असल में बस अक्ल ही सही शब्द है. धर्म शब्द त्याग देने योग्य है. कर्तव्य क्या है, कानून क्या है यह सब अक्ल से तय करना चाहिए. हमअक्ल से ही कानून भी बदल लेते हैं.अक्ल से ही हम नियम भी बदल लेते हैं. संविधान / विधान सब बदलते हैं. एक तरफ की सड़क बंद कर देते हैं. फिर खोल देते हैं. नियम/कायदे/कानून में बदलाव करते हैं...और अगर नियम गलत हो तो उसका विद...

गुरु गोबिंद सिंह

आज मेरे दफ्तर में बात कर रहा था मैं. राज कुमार मित्तल थे और भी मित्र थे. गुरु गोबिंद सिंह. कोई दिन त्यौहार नहीं है उनसे जुड़ा. लेकिन मुझे बहुत याद आते हैं. बावजूद इसके कि मैं धर्म/दीन/ मज़हब/सम्प्रदाय को गलत मानता हूँ और उन्होंने खालसा का निर्माण किया था. "सब सिक्खन को 'हुक्म' है, गुरु मान्यों ग्रन्थ" कहा था. मैं सख्त खिलाफ हूँ उनके इस काम से. लेकिन. लेकिन फिर भी मन में उनके लिए अपार सम्मान है.  आम इन्सान कैसे जीता है? शादी करेगा. बच्चे करेगा. फिर उनकी शादी करेगा. फिर वो बच्चे करेंगे. खायेगा. पीएगा. सेक्स करेगा. और मर जाएगा. अमीर थोड़ा अच्छे लेवल पे करेगा और गरीब थोड़ा हल्के लेवल पे. लेकिन अमीर हो गरीब हो, हर इन्सान यही करेगा.  गोबिंद सिंह. गुरु गोबिंद सिंह. गुरु शब्द का अर्थ है जिसमें गुरुता हो, गुरुत्व हो, भारीपन हो. गुरु वो इसलिए हैं कि मेरी नज़र में वो वाकई भारी व्यक्तित्व हैं.  तो गुरु गोबिंद सिंह. उन्होंने अपने पिता को कुर्बान कर दिया. चारों बेटों को कुर्बान कर दिया. और खुद को कुर्बान कर दिया. किस लिए? हिन्दू के लिए? न. न. उनको क्या हिन्दू से मतलब?  भाई कन्...

न्यूज़ीलैंड में मुस्लिमों का कत्ल

मुझे दुःख है कि न्यूज़ीलैंड में मुस्लिम मारे गए. लेकिन क्या मुस्लिम ने यह सोचा कि जब से इस्लाम आया तब से आज तक कितने गैर-मुस्लिम मुस्लिम ने मार दिए इस्लाम की वजह से?  कितने मुस्लिम मार दिए यह समझते हुए कि असल इस्लाम उसका है सामने वाले का नहीं?  कितने शहर उजाड़ दिए? कितनी Library जला दी चूँकि कुरान के अलावा सब किताब बेकार है? कितनी औरतें सेक्स-गुलाम बना ली गईं चूँकि उनका शौहर/भाई/बाप जंग हार गया था ?  हो सकता है इस्लाम यह सब न सिखाता हो. लेकिन दुनिया क्यों कत्ल-बलात्कार-आगजनी का शिकार हो चूँकि कोई भटके हुए लोगों ने इस्लाम को सही-सही नहीं समझा? किसी की नासमझी के लिए कोई क्यों जान दे? बलात्कार का शिकार क्यों हों? और वैसे मुझे तो यह ही शंका है कि ये तथा-कथित शांति-वादी  लोग कुछ गलत समझते हैं कुरान को.  मुझे लगता है कि यही लोग सही-सही समझते हैं कुरान को चूँकि क़ुरान सीधा आदेश देता है गैर-मुस्लिम के खिलाफ.  सो जब मुस्लिम ज़हर उगल रहे  हैं उनके खिलाफ जो ख़ुशी मना रहे हैं न्यूज़ीलैंड में मारे गए मुस्लिमों की मौत पर, तो जरा ठीक-ठीक समझें कि यह ख़ुशी अ...