खतरनाक ग्रन्थ

 मैं सब धार्मिक किताबों को नकारता हूँ. इसलिए नहीं कि वो ग़लत हैं. न. वो ग़लत भी हैं और सही भी हैं. कहीं ग़लत, कहीं सही. कुछ बहुत गलत, कुछ बहुत सही. दिक्कत यह है कि इन्सान ने इन किताबों को किताबों की तरह नहीं देखा. पवित्र ग्रन्थों की तरह देखा है. कोई बस मत्थे टेके जा रहा है, कोई बस पाठ ही किये जा रहा है, कोई तो इन के खिलाफ़ बोलने वाले को कत्ल ही कर देता है, कोई दंगा खड़ा कर देता है. सो इन ग्रन्थों ने जितना इन्सान का नुक्सान किया है शायद किसी भी अन्य चीज़ ने नहीं. इन ग्रन्थों ने इंसानी सोच को बाँध दिया है. ये ग्रन्थ पाश साबित हुए हैं इंसानी सोच के लिए. इन्सान पशु से उठा लेकिन फिर इन ग्रन्थों से बंध पशु से भी नीचे गिर गया. ~तुषार कॉस्मिक

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