मुझे हमेशा 'नागरिकता' और 'सिटीजन-शिप', ये दोनों शब्द उलझन में डाल देते हैं. जो लोग ग्रामीण होते हैं, वो नागरिक नहीं होते क्या?
अंग्रेज़ी में तो 'कंट्री' शब्द ही गाँव के लिए प्रयोग होता है. बहुत पहले हम क्रॉस कंट्री दौड़ लगाया करते थे. तब तो मैंने ध्यान ही नहीं दिया इस शब्द पर. लेकिन आज मतलब पता है. गाँवों में से दौड़ते हुए जाना.
किसी दौर में गाँव ही कंट्री था. मेरा गाँव, मेरा देश. लेकिन फिर नगर बस गए. तो नागरिकता ही राष्ट्रीयता हो गई. सिटीजन-शिप मतलब नेशनलिटी.
यहीं लोचा है, हमने नागरिकता को ग्रामीणता से, कस्बाई जीवन से, आदिवासी जीवन से, वनवासी जीवन से बेहतर मान रखा है. शहरी-करण बाकी सब तरह के जीवन पर आच्छादित हो गया है. जबकि बहुत मानों में शहरीकरण ही इंसानियत की सब बीमारियों का जनक है. शहरीकरण मात्र जनसंख्या वृद्धि की मजबूरी है.
यही वजह है कि जिसे 'कंट्री-शिप' कहना चाहिए उसे हम 'सिटीजन-शिप' कहते हैं. और मेरे लिए तो और भी दिक्कत है. मुझे जब कोई परिचय पूछता है तो खुद को भारत का नागरिक बताते हुए उलझन में पड़ जाता हूँ. मैं तो खुद को 'कॉस्मिक' मानता हूँ, वो जो कॉसमॉस यानि ब्रह्मांड से ही सम्बन्ध मानता है खुद का. ज़र्रे-ज़र्रे से. कैसे कहूं कि मैं हूँ कौन? बुल्ला की जाणा मैं कौन?
खैर, खुद को 'तुषार कॉस्मिक' कह कर काम चलाता हूँ.
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