वहम है कि नोट-बंदी से प्रॉपर्टी सस्ती हो जायेगी. प्रॉपर्टी में हूँ सालों से. कुछ नहीं होगा. लोग रेट कम कर ही नहीं रहे. कौन अपनी करोड़ों रुपये की जायदाद रातों-रात आधी कीमत पर बेचने को राज़ी होगा?
जिसकी कोई ज़बरदस्त ज़रूरत हो तो बेच भी जाए, लेकिन ऐसे लोग तो पहले भी औने -पौने में बेच जाते थे. बावज़ूद उसके बगल वाली प्रॉपर्टी उससे सवाये रेट पर बिकती थी. बगल वाली क्या उसी प्रॉपर्टी को खरीदने वाला सवाई ढेड़ गुणा कीमत पर बेच जाता था.
सो अभी लोग इंतज़ार करेंगे. कौन जाने अढाई साल बाद सरकार बदल जाए. नई पालिसी आ जाए.
और खरीदने वाले को भी कैसे कुछ सस्ता मिलेगा? वो अगर एक करोड़ रुपये की प्रॉपर्टी को तीस लाख रुपये में दिखाता था तो आज उसे अगर वही प्रॉपर्टी सत्तर लाख रुपये में मिल भी जाए तो जो चालीस लाख रुपये वो पहले से ज़्यादा वाइट में दिखा रहा है उस पर टैक्स नहीं भरेगा क्या?
कोई खास फर्क नहीं है खरीदने वाले को. वो पहले सारा धन बेचने वाले को देता था, अब अगर बेचने वाले को थोड़ा कम दिया भी तो जितना कम देगा, उससे कहीं ज़्यादा सरकार को टैक्स देना होगा.
सो नतीजा निल-बटा-सन्नाटा.
जिसकी कोई ज़बरदस्त ज़रूरत हो तो बेच भी जाए, लेकिन ऐसे लोग तो पहले भी औने -पौने में बेच जाते थे. बावज़ूद उसके बगल वाली प्रॉपर्टी उससे सवाये रेट पर बिकती थी. बगल वाली क्या उसी प्रॉपर्टी को खरीदने वाला सवाई ढेड़ गुणा कीमत पर बेच जाता था.
सो अभी लोग इंतज़ार करेंगे. कौन जाने अढाई साल बाद सरकार बदल जाए. नई पालिसी आ जाए.
और खरीदने वाले को भी कैसे कुछ सस्ता मिलेगा? वो अगर एक करोड़ रुपये की प्रॉपर्टी को तीस लाख रुपये में दिखाता था तो आज उसे अगर वही प्रॉपर्टी सत्तर लाख रुपये में मिल भी जाए तो जो चालीस लाख रुपये वो पहले से ज़्यादा वाइट में दिखा रहा है उस पर टैक्स नहीं भरेगा क्या?
कोई खास फर्क नहीं है खरीदने वाले को. वो पहले सारा धन बेचने वाले को देता था, अब अगर बेचने वाले को थोड़ा कम दिया भी तो जितना कम देगा, उससे कहीं ज़्यादा सरकार को टैक्स देना होगा.
सो नतीजा निल-बटा-सन्नाटा.
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