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मेरा यूटूएब चैनल - तुषार कॉस्मिक. My YouTube Channel - Tushar Cosmic

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Tushar   Cosmic     यह मेरा   यूट्यूब  चैनल  है.  नया है...ऑडियंस बनते-बनते बनेगी ..... आप मित्र गण  ही बनाएंगे .... यूट्यूब अपने आप कोई ऑडियंस देता नहीं है ..... खुद से बनानी होती है...... आप मित्रगण ही बना सकते हैं...बन सकते हैं ...वीडियो देखिये.....पूरा देखिये....... मेरा वादा है सीखने को मिलेगा निश्चित ही.                        https://www.youtube.com/@Tushar-Cosmic

!!!!! हिंदी दिवस, एक बेमानी प्रयास !!!!!

किसी भी भाषा के लिए दिवस विशष मनाया जाना एक खतरे की निशानी है। उस भाषा के लिए और उस भाषा भाषियों के लिए भी। आखिरकार ज़रुरत ही क्यों पड़े कि लोगों को अपनी भाषा के प्रसार के लिए दिवस विशेष मानाने पड़ें ..?

अगर आप अपने इर्दगिर्द नज़र घुमायेंगे तो पायेंगे कि जो भी आविष्कार हैं उनमें शायद ही कोई हों जो हिंदी भाषियों ने आविष्कृत किये हों, और जो हैं भी वो शताब्दियों पहले के हैं, और जो भी हैं वो नाम मात्र को हैं। हमारा तथाकथित वैज्ञानिक भी नकलची भर है। जैसे जीवन नहीं रुकता वैसे ही ज्ञान-विज्ञान भी नहीं रुकता। आप लाख गर्व करें कि ज़ीरो भारत ने दिया लेकिन असलियत ये है कि हम ज्ञान-विज्ञान के प्रसार को बरकरार नहीं रख पाए।

और भाषाएं कोई जोर ज़बरदस्ती से विकसित नहीं होती। भाषाएं कोई दिवस मनाने से विकसित नहीं होती। भाषाएं विकसित होती हैं अगर वो जीवन को गति देती हों, अगर वो जीवन को कुछ दान देती हों, अगर उनसे रोज़गार मिलता हो। भाषाएं विकसित होती है अगर उनसे विकास मिलता हो।

लगभग आधी दुनिया अंग्रेज़ों के प्रभाव में रही है। लगभग सारा विज्ञान पश्चिम की देन है। लगभग सारा का कंप्यूटर-इन्टरनेट अंग्रेजी भाषा में है और विज्ञान से व्यापार, व्यवहार, सब आन जुड़ता है। अंग्रेजी आज निश्चित ही वैश्विक भाषा का दर्जा रखती है। आज अंग्रेजी न सीखना जीवन की गति को निश्चित ही बाधित करेगा।

और भारत में, उत्तर भारत की भाषाएं तो हिंदी से मिलती-जुलती हैं। यहां तो हिंदी आसानी से समझी बोली जाती है लेकिन दक्षिण भारत और कई अन्य हिस्सों की भाषायों का हिंदी से कोई मेल नहीं, हिंदी तो पूरे भारत भर में भी संचार का माध्यम नहीं है।

यदि मंगल गृह का विज्ञान हम से ज्यादा विकसित हो तो क्या उनकी भाषा सीखना हमारे लिए ज़रूरी न हो जाएगा। सीधा-सा सूत्र है भाषा वही बच पायेगी जिसकी ज्यादा ज़रुरत महसूस होगी और जैसे सभ्यताएं मरती हैं वैसे ही उनकी भाषाएं भी। जोकि अधिकांशतः मानव विकास के लिए अच्छा है।

निष्कर्ष ये है कि हिंदी दिवस मनाने से न कुछ हुआ है न होगा, हिंदी बचानी है तो दुनिया को इस भाषा में बढ़िया साहित्य दें, ज्ञान विज्ञान दें, दुनिया को इतना दान दें इस भाषा में कि हिंदी सीखना उसकी मजबूरी हो जाए और ये बात मात्र हिंदी पर नहीं दुनिया की हर उस भाषा पर लागू होती है।

वैसे यदि हम सच में विश्व बंधुत्व और वसुधैव कुटुम्बकम की धारणा को ठीक से समझते हों तो हमें बिल्कुल फर्क नहीं पड़ना चाहिए कि हिंदी मरी या बची। हमें मात्र मानव विकास पर ध्यान देना चाहिए न कि किसी भाषा विशेष के प्रसार पर, भाषाएं अपना रास्ता खुद-ब-ख़ुद बना लेंगी।

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