मैंने तकरीबन बीस साल की उम्र तक कोई साउथ इंडियन खाना नहीं खाया था...वहां पंजाब में उन दिनों यह होता ही नहीं था, बठिंडा में तो नहीं था.....यहाँ दिल्ली आया तो खाया.
मुझे इनका अनियन उत्तपम जो स्वाद लगा तो बस लग गया........कनौट प्लेस में मद्रास होटल हमारा ख़ास ठिकाना हुआ करता था, सादा सा होटल, बैरे नंगे पैर घूमते थे, आपको सांबर माँगना नहीं पड़ता था... खत्म होने से पहले ही कटोरे भर जाते थे, गरमा गर्म....वो माहौल, वो सांबर, वो बैरे..वो सब कुछ आज भी आँखों के आगे सजीव है.......मद्रास होटल अब बंद हो चुका है......वैसा दक्षिण भारतीय खाना फिर नहीं मिला.....फ़िर 'श्रवण भवन' जाते थे, कनाट प्लेस भी और करोल बाग भी, लेकिन कुछ ख़ास नहीं जंचा...... अब सागर रत्न रेस्तरां मेरे घर के बिलकुल साथ है...मुझे नहीं जमता.
खैर, आज भी डबल ट्रिपल प्याज़ डलवा कर तैयार करवाता हूँ.....उत्तपम क्या बस, प्याज़ से भरपूर परांठा ही बनवा लेता हूँ.....और खूब मज़े से आधा घंटा लगा खाता हूँ......अंत तक सांबर चलता रहता है साथ में......और अक्सर सोचता हूँ कि काश पहले खाया होता, अब शायद हों वहां बठिंडा में डोसा कार्नर, मैंने तो अभी भी नहीं देखे
आप क्या चूक रहे हैं आपको तब तक पता नहीं लगता जब तक आपने उसका स्वाद न लिया हो
IAS/IPS का ज़िक्र था तो हमऊ ने थोड़ा जोगदान दई दिया........
"एक ख़ास तरह की मूर्खता दरकार होती है इस तरह के इम्तिहान पास करन के वास्ते.......मतबल एक अच्छा टेप रेकार्डर जैसी.........कभू सुने हो भैया कि इस तरह के आफिसर लोगों ने कुछ साहित वाहित रचा हो......कौनो बढ़िया.......कोई ईजाद विजाद किये हों....कच्छु नाहीं...बस रट्टू तोते हैं कतई ....चलो जी, चलन दो ..अभी तो चलन है."
कहो भई, ठीक लिखे थे हमऊ कि नाहीं ?
मैं सहमत हूँ शन्कराचार्य से शत प्रतिशत ...बिलकुल शूद्र को जाना नही चाहिए मंदिर...प्रवेश छोड़ो देखना तक नही चाहिए....बिलकुल.....बिलकुल...........मन्दिर इस काबिल हैं ही नही
क्योंकि छाछ भी कभी दही थी........बदलना तो बनता है
क्योंकि सास भी कभी बहु थी.........बदला तो बनता है
कल दूर ग्रह के विशालकाय, शक्तिशाली प्राणी पृथ्वी पर उतरने वाले हैं, कल ही उनकी मानव-ईद है, उनको हिदायत है उनके पैगम्बर की कि कल के दिन मुस्लिम मानवों की कुरबानी उनके प्यारे अल्लाह को हर हाल में दी जानी चाहिए
सपने....हमारे अंतर्मन में छुपी, दबी भावनाएं हैं, विचार हैं...चित्र हैं...कल्पनाएँ हैं
हमारा अपना गढ़ा संसार.......बस मन पर से तर्क की लगाम हट जाती है
और जैसे बंधे जानवर को खुला छोड़ दो तो वो कहीं भी भागता है..ठीक वैसे ही सोते ही मन की लगाम ढीली हो जाती है...मतलब तार्किक मन की
इसे अर्ध-चेतन मन कहते हैं, जो सपनों में सक्रिय होता है
जन्म से लेकर आज तक जो भी दबा होता है सब कभी भी सपना बन बाहर आ सकता है
सब कुछ इसमें दफन रहता है
एक तरह का बेसमेंट
अपने ही मन का प्रक्षेपण होते हैं सपने और कुछ नही
सोने से पहले खुद को इंस्ट्रक्शन दे कर सोवो कि आपको किस तरह के सपने देखने हैं...सपने बदल जायेंगे
!!! अबे तुम इंसान हो या उल्लू के पट्ठे, आओ मंथन करो !!!!
उल्लू के प्रति बहुत नाइंसाफी की है मनुष्यता ने.......उसे मूर्खता का प्रतीक धर लिया...... उल्लू यदि अपने ग्रन्थ लिखेगा तो उसमें इंसान को मूर्ख शिरोमणि मानेगा......जो ज्यादा सही भी है.........अरे, उल्लू को दिन में नही दिखता, क्या हो गया फिर, उसे रात में तो दिखता है, इंसान को तो आँखें होते हुए, अक्ल होते हुए न दिन में, न रात में कुछ दिखता है या फिर कुछ का कुछ दिखता है. इसलिए ये जो phrase है न UKP यानि "उल्लू का पट्ठा" जिसे तुम लोग, मूर्ख इंसानों के लिए प्रयोग करते हो, इसे तो छोड़ ही दो, कुछ और शब्द ढूंढो और गधा वधा कहना भी छोड़ दो, गधे कितने शरीफ हैं, किसी की गर्दनें काटते हैं क्या ISIS की तरह या फिर एटम बम फैंकते हैं अमरीका की तरह.....कुछ और सोचो, हाँ किसी भी जानवर को अपनी शब्दावली में शामिल मत करना...कुत्ता वुत्ता भी मत कहना, बेचारा कुत्ता तो बेहद प्यारा जीव है......वफादार, इंसान तो अपने सगे बाप का भी सगा नही......तो फिर घूम फिर के एक ही शब्द प्रयोग कर लो अपने लिए...इन्सान...तुम्हारे लिए इससे बड़ी कोई गाली नही हो सकती...चूँकि इंसानियत तो तुम में है नहीं....और है भी तो वो अधूरी है चूँकि उसमें कुत्तियत, बिल्लियत , गधियत, उल्लुयत शामिल नही हैं...सो जब भी एक दूजे को गाली देनी हो, इंसान ही कह लिया करो....ओये इन्सान!!!!...हाहहहाहा!!!!
स्मृति इरानी को देख वैसे लगता नही कि सास भी कभी बहु थी, लगता है, वो सास है और सास ही थी. नही ?
हम एक समाज हैं, सबकी माँ, बहन हैं....,ये क्या बकवास दिखाते हैं कि एक deo लगा डाला तो हर लड़की झींगालाला........बाज़ार में बिठाल के रखा है नारी अस्मिता को.....लड़की न हुई कोई बिना दिल दिमाग की वस्तु हो गयी जो बस किसी टूथ पेस्ट या deo की खुशबु से सारी अक्ल छोड़ देगी और खुद को इस खुशबु वाले पर उड़ेल देगी...लानत
पटाखे चलाने से जो मना न हों उनको जेल में डाल दिया जाना चाहिए........कुदरत हमारी माँ है, जो माँ की चुनरी में आग लगाये उसे सज़ा देना तो बनता है......ये इन्सान के पट्ठे समझाने से नही समझने वाले.....इनके लिए इनके त्यौहार ज़रूरी हैं.......इनके धर्म से जुड़े हुए हैं न.......कुदरत के प्रति.....Mother Nature के प्रति इनका कोई धर्म है वो ये ऐसे तो नही समझने वाले..........
"सामाजिक और व्यक्तिगत मान्यताएं"
व्यक्ति किसी न किसी माँ से पिता से तो पैदा होगा ही, किसी न किसी घर में पैदा होगा ही, किसी न किसी समाज में, किसी न किसी मुल्क में.....अब यह क्या ज़रूरी है व्यक्ति अपने माँ बाप, समाज, देश की मान्यताओं को मानता ही हो?
उसके इर्द गिर्द के लोग मानते हो सकते हैं..लेकिन उससे क्या? उसकी पत्नी, उसके दोस्त, उसके रिश्तेदार मानते हो सकते हैं, लेकिन उससे क्या? दोस्तों और रिश्तेदारों के बुलाने पर धार्मिक कार्यक्रमों में, सामाजिक कार्यक्रमों में शिरकत भी की जा सकती है, लेकिन उससे क्या?
व्यक्ति की मान्यताएं निहायत निजी मामला है. सामाजिकता बिलकुल अलग मामला है......
अभी एक मित्र पर फ़ोन से बात हो रही थी......उनका कहना यह था कि व्यक्ति जिस समाज में रहता है, कितना ही कहे कि उसकी मान्यताएं उस समाज से अलग हैं लेकिन फिर भी कुछ न कुछ असर तो रह ही जाता है, जैसे गांधी कहते रहे ईश्वर अल्लाह तेरो नाम, लेकिन जब गोली लगी तो मुंह से निकला 'हे राम'....'या अल्लाह' नहीं निकला.........
मेरा कहना यह था कि आप मेरे पास, मेरे साथ नहीं रहते वरना आप शायद जान पाते कि मेरे घर में, समाज में, सब लोग सब तरह की धार्मिक मान्यताओं को मानने वाले हैं लेकिन उन सब में रहते हुए भी मैं नहीं मानता हूँ
आप गांधी की बात करते हैं.....ज़रा सुकरात को देखिये, यदि वो समाज की मान्यताओं को मानते होते तो ज़हर क्यों पिलाया जाता?
आप बाबा नानक को देखिये, उन्हें बचपन में ही समझ आ गया, जनेऊ को इनकार कर दिए, हिन्दू घर में पैदा हुए थे, कालू राम मेहता, पिता का नाम.....लेकिन हिन्दू मान्यताओं से बाहर हैं नानक साहेब.......सूर्य को जल चढ़ाने को इनकार कर दिए.........देश विदेश की सीमा से बाहर हैं वो......गगन में थाल, सूर्य, चंद दीपक बने.......यह तो आरती गाते हैं
मिसालें आपको और भी बहुत मिल जायेंगी......लेकिन यदि न देखना चाहें, तो मर्ज़ी आपकी है......कहना यह है मित्रवर कि अपनी मान्यताओं को दूसरों पर न थोपें...अपने चश्में से देख सकते हैं...लेकिन अपने दृश्य दूसरों पर न थोपें और सर्वोतम तो यह है कि चश्में उतार कर देखें
एक से एक मूर्ख भरे पड़े हैं दुनिया में, कैसे भी अपनी धारणाएं दूसरों पर उड़ेलने में प्रयासरत रहते हैं ....
एक फेसबुक मित्र को मैंने कहीं गुरबाणी का एक श्लोक समझने को कह दिया तो उनको लगा कि मैं सिक्ख हूँ?
फिर उन्ही को मैंने अपना एक आर्टिकल पढने को दिया जिसमें मैंने लिखा है कि मेरे घर में माँ वाहगुरू वाहगुरू करती हैं, पत्नी मंदिर में घंटी बजाती हैं और मैं और बेटी यह सब नहीं मानते, हमारी मान्यताएं हमारी समझ से निर्धारित हैं और कोई किसी को मान्यताओं में ज़बरदस्ती नहीं करता....अब इनको इससे लगा कि यही तो हिन्दुत्व है.
फिर पूछने पर इनको बताया कि मैं अपने नाम के साथ अरोड़ा अपनी वजह से नहीं लगाता, फेसबुक ने कागज़ात मांगे इसलिए लगाना पड़ा......Cosmic लगाता था और वही अब भी लगाना पसंद करूंगा.....लेकिन इनको यह बात समझ ही नहीं आई....इनके हिसाब से मैं जात पात को मानता हूँ इसलिए अरोड़ा लगा रहा हूँ..........
खैर, इनको लाख कहता रहा कि न मेरा सिक्ख धर्म में कोई यकीन है, न हिन्दू में, न हिंदुत्व में, न ही जात पात में, लेकिन लगता नहीं कि इनको समझ आया होगा
अपनी सोच कैसे दूसरों पर कोई फेंकता है, इसका ओछा उद्धरण है यह
किसी विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में छात्रों ने भारतीय वस्त्र पहने हैं......गर्व के साथ बताया जा रहा है.........ज़्यादा गर्व की बात तब होगी जब छात्र ड्रेस कोड के ही खिलाफ खड़े हों....भारतीय हो या पश्चिमी ......इस तरह के ड्रेस कोड सब बंधन हैं, गुलामी है......शिक्षा का इस सब से क्या मतलब?.....सही शिक्षा तर्क सिखाएगी, बगावत हर तरह के बंधन के खिलाफ़
अंग्रेज़ी में कहते हैं, "रीडिंग बिटवीन दी लाइन्स" यानि शब्दों के छुपे मतलब भी समझना......होता होगा ऐसा....लेकिन मैं यह देखता हूँ कि सीधे सीधे, साफ़ साफ़ शब्दों के ज़रिये भी बात समझाना बहुत मुश्किल होता है .........लोग शब्द पढ़ते हैं, अर्थ भी समझते हैं शब्दों के, लेकिन बात का कुल जमा मतलब फिर भी या तो समझते नहीं, या गलत समझते हैंपश्चिम पूर्व सब भेद सतही हैं, ग्लोबल कल्चर पैदा हुआ जा रहा है.......बहुत कुछ ध्वस्त होने वाला है, बहुत कुछ नया आने वाला है.......पिछले तीस साल में दुनिया ने एक लम्बी छलांग लगाई है......सहस्त्राब्दियों लम्बी........मानव चेतना, बुद्धि में एक दम उछाल आया है.......आगे हर पल नया नया है............और आगे माईकल-आनंद पैदा होंगे और जो कि शुभ है
कछुआ छाप अगरबत्ती या आल आउट लगाने से या इलेक्ट्रिक रैकेट से जो मच्छर मरते हैं, क्या आप समझते हैं कि कोई सुदूर सितारों को कोई उनकी परवाह है?
या इनकी आत्माएं मारने वालों को भूत बन परेशान करती होंगी?
या इनको मारने वाले नर्क में जायेंगे?
या इनको अपना खून चूसने से न रोकने वाले स्वर्ग में जायेंगे?
यकीन जानिये अस्तित्व को उस तरह से हमारे मरने जीने से फर्क नहीं पड़ता जैसा हमने सोच रखा है
हमने खुद को ज़रुरत से कहीं ज़्यादा अहमियत दे रखी है
मैं अपने जितेन्द्र साहेब यानि जम्पिंग जैक जी को कहना चाहता हूँ कि बच्चे सफल हों यह अच्छी बात है लेकिन एकता कपूर की तरह नहीं, जिसे आधी दुनिया गालियाँ देती फिरे कचरा परोसने की वजह से
जीवन की किताब को पढने में किताबें मददगार हो सकती हैं.....सो किताबें तो पढनी ही चाहियें.....और एक दूजे के जो विपरीत हों वो पढनी चाहिए....
जैसे मैं एक बार पढ़ रहा था "गर्व से कहो हम हिन्दू हैं" तो फिर पढ़ रहा था "शर्म से कहो हम हिन्दू हैं"
एक बार पढ़ रहा था "ज्योतिष अध्यात्म का विज्ञान" फिर पढ़ रहा था "ज्योतिष एक ढ़कोसला"
सुना है मोहन भागवत कह रहे हैं कि धर्मान्तरण नहीं चाहते तो कानून लाकर रोको.....बढ़िया है, कानून लाना है तो यह लाओ कि कोई भी बच्चा किसी भी धर्म में नहीं डाला जायेगा जब तक वो इक्कीस साल का नहीं हो जाता.....आयी बात समझ में भागवत जी ?सन सैंतालीस का बटवारा------- यदि मुस्लिमों ने मारे हिन्दू और सिख तो इधर से ऐसा ही मुस्लिमों के साथ भी किया गया .... और करने वाले हिन्दू और सिख थे
और चौरासी के दौर में सिक्ख आतंकियों ने हजारों हिन्दू मार गिराए खालिस्तान के नाम पर
फिर बाबरी मस्जिद, हिन्दू आतंकी , मरी इमारतों की लडाई में जिंदा इंसानों की बली , जिसमें हिन्दू मुस्लिम दोनों मारे गए
किसी वहम में न रहें कोई भी, चाहे हिन्दू हो, मुस्लिम हो, चाहे सिख हो
बात सिर्फ इतनी सी है कि जिस धर्म में पले बढे हैं, वो कैसे गलत हो सकता है, यह समझ आने के लिए अपने माँ बाप, परिवार द्वारा दी गयी मानसिक गुलामियों से बाहर आना पड़ता हैसबसे पहला धर्मांतरण इंसान का उसके माँ-बाप , उसके इर्द गिर्द के लोग करते हैं....बच्चे के साथ गुनाह, बच्चे के साथ अपराध, बच्चे के साथ अधर्म...जो उसे अपना धार्मिक झुनझुना पकड़ा देते हैं......यह है रोकने की बात.....एक बच्चा जब तक बालिग़ नहीं होता उसे कोई भी धर्म देना अपराध होना चाहिए.....और उसे पूरी तरह से सपोर्ट करना चाहिए कि वो सवाल उठाये, तर्क उठाये, उसे विश्वास नहीं तर्क सिखाना चाहिए..फिर यदि उसे किसी धर्म को चुनना हो तो वो बालिग़ होने पे चुन ले.....अब उसके बाद यह उसकी मर्ज़ी होनी चाहिए कि वो जब मर्ज़ी जिस मर्ज़ी धर्म को चुन ले ......और आप हैं कि धर्मांतरण न हो उसके लिए कानून लाने की बात करते हैं....कानून रोकेगा क्या किसी को धर्म में जाने, न जाने से....कानून सिर्फ.यह देख सकता है.कि किसी के साथ फौजदारी न हो...बाकी सब कानून से बाहर का विषय है.
सब धर्म व्यक्ति के तर्क को हरते हैं, धर्म का पहला मन्त्र है अंध-विश्वास,चाहे कोई भी हो,
क्या सिर्फ दूसरे को मारना काटना ही हिंसा है? व्यक्ति को इंसान से रोबोट बनाना भी हिंसा है, और इस मामले में सब धर्म एक जैसे हैं ...
विचार की जगह संस्कार, तर्क की जगह अंध-विश्वास...सब एक जैसे....
हो सकता है सिक्खों में बहुत सी बुराई आपको नज़र न आयें जो किसी और धर्म में नज़र आती हों, लेकिन क्या सिक्ख किसी गुरु पर तार्किक ढंग से विचार करने देंगे, क्या गुरबानी में यदि कुछ न जमता हो तो उसे खुल कर किसी को कहने देंगे?
और हिन्दू यदि रोबोट नहीं होते तो किसी आडवाणी के कहने पर मुर्दा इमारत तोड़ने निकल पड़ते...
विभन्न धर्मों में जो फर्क आपको शायद बड़े लगते हैं ..मुझे वो बहुत छोटे लगते हैं..गौण...इसलिए मेरी नज़र में सब को एक ही तरह से दफा करने का प्रयास करना होगा..
कभी बहुत पहले देखता था भीख मांगने वाले.......न भी दो भीख, तो कहते चलते थे..जो दे उसका भला,जो न दे उसका भी भला
और आज ट्रैफिक सिग्नल पर गाडी रुक भर जाए, ऐसे खिड़कियाँ पीटते हैं जैसे इनका कर्जा देना हो
मजाल है आपको उतनी देर बात करने दें, कुछ सोचने दें, जान छुड़ाने के लिए दी जाती है भीख कई बार
वक्त ने, ज़रुरत ने भीख मांगने और देने की गरिमा तक को छीन लिया है
विडम्बना, कहीं भी दिख जायेगी, बस आप देखने को तैयार होने चाहिए
!भविष्य, एक झलक !
विज्ञान तुम्हें मंगल ग्रह पर ले जाना चाहता है, अन्तरिक्ष की सैर कराना चाहता है..और तुम्हारा तथा कथित धर्म तुम्हें जंगलों, रेगिस्तानो का वासी बनाये रखना चाहता है
फैसला तुम्हारे हाथ है
एक दिन समय आएगा, एक और पृथ्वी जैसा ग्रह खोज लिया जायेगा और प्रगतिशील लोग इस ग्रह को छोड़ आगे बढ़ जायेंगे
और पड़े रहना यहाँ अपने गपोड़ शंख बजाते
फिर जैसे आज अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया में रहने को मरे जाते हो, ऐसे ही उस नए ग्रह पर जाने को तरसते रहोगे
यह सब होने ही वाला है, यकीन मानो मेरा
बहुत पहले मुझे किसी ने समझाया था कि जवाब ढूँढने से पहले सवाल ठीक से समझना चाहिए जवाब अक्सर सवाल में ही छिपे रहते हैं जिन तालों को खोलने के लिए हम चाबियाँ तलाश करने दौड़ पड़ते हैं पहले देख लेना चाहिए ताला लगा भी है या यूँ ही अटका है मिसाल देता हूँ, अगर मिसाल समझ आ गयी तो मसला भी समझ आ जाएगा एक रात, अस्पताल, पुलिस स्टेशन और फायर ब्रिगेड में इकठा आग लग जाती है, अब बताएं कि एम्बुलेंस सबसे पहले कहाँ आग बुझाने जायेगी, वैसे वो खडी अस्पताल की बाहर पार्किंग में ही है
इस मुल्क को रावण से नही दशहरे और राम लीला जैसे बचकाने कामों से छुटकारा पाने की ज़रुरत है...
अब यह मत बक बकाना कि दशहरा बुराई के अंत का प्रतीक है, अगर ऐसा होता तो तुम्हें हर साल रावण मारना और जलाना नहीं पड़ता....यह मूर्खों वाले तर्क अपने पास रखो
असल में तो तुम्हारी बचकाना बुद्धि ही ज़िम्मेदार है , इस रावण के फिर फिर उठ खड़े होने के लिए
वही बुद्धि जो धर्म के नाम पे होने वाली उल-जुलूल हरकतों में लिप्त है, इस बुद्धि से करोगे साइंस में तरक्की?
इस बुद्धि से सिर्फ तुम रावण के पुतले जला कर प्रदूषण करोगे
इस बुद्धि से तुम सिर्फ रावण जला गन्दगी करोगे
इस बुद्धि से तुम्हारा रावण कभी नही मरेगा, देख लेना तुम्हें फिर से मारना और जलाना पड़ेगा अगले साल, फिर अगले साल , साल दर साल
छोड़ो ये किस्से, कहानियां......तुम्हें कुदरत ने सब दिया है, तुम कोई कम हो किसी राम से, अगर कुदरत को राम पर ही रुकना होता तो तुमको पैदा ही नही करती, कुदरत को तुम पर यकीन है, तुम्हें क्यों खुद पर यकीन नहीं, तुमको क्यों दूर दराज़ के तथा कथित भगवानों पे यकीन है
खुद पे यकीन करो.....अगले साल रामलीला नहीं...अपनी जीत, अपनी हार का जश्न मनायेंगे....अगले साल अपने जीवन के किस्से कहानियां सुनायेंगे.....अगले साल लीला यदि होगी तो मेरी और तेरी..जय हो
लानत है, यहाँ हर करेंसी नोट पर मात्र गाँधी का ही चित्र होता है, शायद अम्बेडकर, भगत सिंह, चिटगाँव के सूर्यसेन, आज़ाद, जगदीश बसु, सी वी रमण जैसे व्यक्ति इस देश में कभी हुए नहीं
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